Friday, November 7, 2014

मुक्तक : 632 - ख़ूब पुर्सिश और की


ख़ूब पुर्सिश और की तीमार बरसों तक ॥
हम रहे इक-दूजे के बीमार बरसों तक ॥
कब मिले आसानियों से हम ? जुदाई में
हिज्र की रो-रो सही थी मार बरसों तक ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...