टूटी-फूटी है न तिड़की है और न चटकी है ।।
अपनी उस एक जगह से तुनुक न सटकी है ।।
उसकी तस्वीर हवा भी न जिसको छू सकती ,
उस बुलंदी पे यूॅं दीवार ए दिल की लटकी है।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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टूटी-फूटी है न तिड़की है और न चटकी है ।।
अपनी उस एक जगह से तुनुक न सटकी है ।।
उसकी तस्वीर हवा भी न जिसको छू सकती ,
उस बुलंदी पे यूॅं दीवार ए दिल की लटकी है।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
सच कहता हूॅं हर क्षण , प्रतिपल ,
मैं हूॅं तेरी प्रीत में पागल ।।
तेरी , मेरी क्या तुलना ? तू ,
स्वर्ण खरा मैं केवल पीतल ।।
मैं भी बजता , बजती तू भी ,
पर मैं घण्टा , तू है पायल ।।
मैं भी सबकी प्यास बुझाता ,
पर तू मदिरा , मैं सादा जल ।।
तेरा मेरा मेल कहाॅं ? तू ,
नील नदी मैं थार मरुस्थल ।।
माना मैं भी पुष्प हूॅं पर सच ,
मैं गुड़हल तू रक्तिम पाटल ।।
मैं गाता भी काक लगूॅं तू ,
चीखे भी तो लगती कोयल ।।
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति
इसमें अभिलाषाओं की कुछ भस्म भर है ।।
आजकल मेरा हृदय परित्यक्त घर है ।।
पहले मनुजों के भी थे रहवास इस पर ,
अब धरा देवों या दनुजों का नगर है ।।
हाॅं मेरे दृग शुष्क मरुथल ही लगें पर ,
मन निरंतर अश्रुओं से तर ब तर है ।।
मुझसे क्यों ताली बजाने को कहो जब ,
जानते हो मेरा केवल एक कर है ?
उनके आगे मुॅंह नहीं खुलता किसी का ,
मेरे सम्मुख मूक भी होता मुखर है !!
हाॅं ! कला ही से न सबका पेट भरता ,
पर नहीं अभिशाप ये , ये एक वर है ।।
रोके क्या कर लेगा कोई जानकर भी ,
यह कि जीवन अंततोगत्वा समर है ?
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति
जुगनुओं का भी न जो दीदार कर पाया ,
वो चला है सूर्य से ऑंखों को करने चार !!
इस तरफ़ से उस तरफ़ पुल से न जो पहुॅंचा ,
तैरकर सागर को वो करने चला है पार !!
सब ही कहते हैं कि वो ये कर न पाएगा ,
दो ही दिन में घर को बुद्धू लौट आएगा ,
बस मुझे ही क्यों न जाने पर हक़ीक़त में ,
फ़त्ह पर उसकी न होता शक़ तुनक इस बार !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
हाथियों जैसा न बन , मत चींटियों सा भी ;
बाज भी मत बन , न बन , तू तितलियों सा भी ;
साॅंप मत बन , और न बन , तू केंचुए जैसा ;
गाय भी मत बन , न बनना , तेंदुए जैसा ;
मत कभी बनना तू मछली , या मगर कोई ;
ना तू बनना देवता , ना जानवर कोई ;
सीखले ये बात , औरों को भी ये सिखला ,
आदमी है तू ! तो बस ; बन आदमी दिखला ।।
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति
पल को लगता है भलाई नहीं भलाई में ।।
पल में लगता है बुराई तो है बुराई में ।।
उनके तुम,उनके हम,उनके वो,दुनिया भी उनकी ,
अपना तो एक भी अपना नहीं ख़ुदाई में ।।
छू रहीं अर्श को पनडुब्बियाॅं भी उनकी सच ,
अपने राकेट भी औंधे पड़े हैं खाई में ।।
सिर हमारा है ये कमअक़्ल पीठ गदहे की ,
काम आता है फ़क़त बोझ की ढुलाई में ।।
आम ओ आसान हुई जाए दिन ब दिन अब तो ,
अब क़सम से न रहा लुत्फ़ आश्नाई में ।।
काट देते न ज़ुबाॅं तुम हमारी जो पहले ,
हमको मिलती न महारत क़लम घिसाई में ।।
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति
मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...