इसमें अभिलाषाओं की कुछ भस्म भर है ।।
आजकल मेरा हृदय परित्यक्त घर है ।।
पहले मनुजों के भी थे रहवास इस पर ,
अब धरा देवों या दनुजों का नगर है ।।
हाॅं मेरे दृग शुष्क मरुथल ही लगें पर ,
मन निरंतर अश्रुओं से तर ब तर है ।।
मुझसे क्यों ताली बजाने को कहो जब ,
जानते हो मेरा केवल एक कर है ?
उनके आगे मुॅंह नहीं खुलता किसी का ,
मेरे सम्मुख मूक भी होता मुखर है !!
हाॅं ! कला ही से न सबका पेट भरता ,
पर नहीं अभिशाप ये , ये एक वर है ।।
रोके क्या कर लेगा कोई जानकर भी ,
यह कि जीवन अंततोगत्वा समर है ?
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति
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