Sunday, February 23, 2025

ग़ज़ल

 











इसमें अभिलाषाओं की कुछ भस्म भर है ।।

आजकल मेरा हृदय परित्यक्त घर है ।।

पहले मनुजों के भी थे रहवास इस पर ,

अब धरा देवों या दनुजों का नगर है ।।

हाॅं मेरे दृग शुष्क मरुथल ही लगें पर ,

मन निरंतर अश्रुओं से तर ब तर है ।।

मुझसे क्यों ताली बजाने को कहो जब ,

जानते हो मेरा केवल एक कर है ?

उनके आगे मुॅंह नहीं खुलता किसी का ,

मेरे सम्मुख मूक भी होता मुखर है !!

हाॅं ! कला ही से न सबका पेट भरता ,

पर नहीं अभिशाप ये , ये एक वर है ।।

रोके क्या कर लेगा कोई जानकर भी ,

यह कि जीवन अंततोगत्वा समर है ?

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 

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