Sunday, February 22, 2026

मुक्तक

 











टूटी-फूटी है न तिड़की है और न चटकी है ।।

अपनी उस एक जगह से तुनुक न सटकी है ।।

उसकी तस्वीर हवा भी न जिसको छू सकती ,

उस बुलंदी पे यूॅं दीवार ए दिल की लटकी है।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, March 7, 2025

ग़ज़ल

 


बना दो इनको , बना दो उनको , 
हमें मिटा दो , हमारा क्या है ?
गुनाह सब ही , के बख़्श दो बस , 
हमें सज़ा दो , हमारा क्या है ? 1
बस इक दफ़्आ ही , तरेर ऑंखें , 
उन्हें दिखाओ , तो तुमको मानें ,
हज़ारों ताने , या गालियाॅं तुम , 
हमें सुना दो , हमारा क्या है ?2
वो देवता हैं , अदब से उनकी ,
निकालो मय्यत , हम आदमी हैं ,
हमें बहा दो , हमें गड़ा दो , 
हमें जला दो , हमारा क्या है ?3
तुम उनसे करना , वफ़ा ही वर्ना, 
फ़ना वो रख देंगे तुमको करके ,
क़दम-क़दम पर फ़रेब हमसे 
करो , दग़ा दो , हमारा क्या है ?4
ये जान लो तुम , न होगा आसाॅं , 
तम्हारा उॅंगली , उठाना उन पर ,
तमाम इल्ज़ाम हम पे झूठे , 
भले लगा दो , हमारा क्या है ?5 
वो काॅंच से भी , हैं नाज़ुक उनको , 
कपास पर भी , जतन से रखना ,
हैं हम तो पत्थर , हमें पटककर , 
कहीं बिठा दो , हमारा क्या है ?6
बबूल के काॅंटों की हों नोकें 
या पत्थरों के , हों टेढ़े ऑंगन ,
हैं माहिर ए रक़्स हमें हो जी जब ,
कहीं नचा दो , हमारा क्या है ?7
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 



Tuesday, February 25, 2025

ग़ज़ल

 











सच कहता हूॅं हर क्षण , प्रतिपल ,

मैं हूॅं तेरी प्रीत में पागल ।।

तेरी , मेरी क्या तुलना ?  तू ,

स्वर्ण खरा मैं केवल पीतल ।।

मैं भी बजता , बजती तू भी ,

पर मैं घण्टा , तू है पायल ।।

मैं भी सबकी प्यास बुझाता ,

पर तू मदिरा , मैं सादा जल ।।

तेरा मेरा मेल कहाॅं ? तू ,

नील नदी मैं थार मरुस्थल ।।

माना मैं भी पुष्प हूॅं पर सच ,

मैं गुड़हल तू रक्तिम पाटल ।।

मैं गाता भी काक लगूॅं तू ,

चीखे भी तो लगती कोयल ।।

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 



Sunday, February 23, 2025

ग़ज़ल

 











इसमें अभिलाषाओं की कुछ भस्म भर है ।।

आजकल मेरा हृदय परित्यक्त घर है ।।

पहले मनुजों के भी थे रहवास इस पर ,

अब धरा देवों या दनुजों का नगर है ।।

हाॅं मेरे दृग शुष्क मरुथल ही लगें पर ,

मन निरंतर अश्रुओं से तर ब तर है ।।

मुझसे क्यों ताली बजाने को कहो जब ,

जानते हो मेरा केवल एक कर है ?

उनके आगे मुॅंह नहीं खुलता किसी का ,

मेरे सम्मुख मूक भी होता मुखर है !!

हाॅं ! कला ही से न सबका पेट भरता ,

पर नहीं अभिशाप ये , ये एक वर है ।।

रोके क्या कर लेगा कोई जानकर भी ,

यह कि जीवन अंततोगत्वा समर है ?

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, December 15, 2024

सूर्य

 











जुगनुओं का भी न जो दीदार कर पाया ,

वो चला है सूर्य से ऑंखों को करने चार !!

इस तरफ़ से उस तरफ़ पुल से न जो पहुॅंचा ,

तैरकर सागर को वो करने चला है पार !!

सब ही कहते हैं कि वो ये कर न पाएगा ,

दो ही दिन में घर को बुद्धू लौट आएगा ,

बस मुझे ही क्यों न जाने पर हक़ीक़त में ,

फ़त्ह पर उसकी न होता शक़ तुनक इस बार !! 

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, December 2, 2024

आदमी

 



















हाथियों जैसा न बन , मत चींटियों सा भी ;

बाज भी मत बन , न बन , तू तितलियों सा भी ;

साॅंप मत बन , और न बन , तू केंचुए जैसा ;

गाय भी मत बन , न बनना , तेंदुए जैसा ;

मत कभी बनना तू मछली , या मगर कोई ;

ना तू बनना देवता , ना जानवर कोई ;

सीखले ये बात , औरों को भी ये सिखला ,

आदमी है तू ! तो बस ; बन आदमी दिखला ।।

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 


Sunday, December 1, 2024

ग़ज़ल


 










पल को लगता है भलाई नहीं भलाई में ।।

पल में लगता है बुराई तो है बुराई में ।।

उनके तुम,उनके हम,उनके वो,दुनिया भी उनकी ,

अपना तो एक भी अपना नहीं ख़ुदाई में ।।

छू रहीं अर्श को पनडुब्बियाॅं भी उनकी सच ,

अपने राकेट भी औंधे पड़े हैं खाई में ।।

सिर हमारा है ये कमअक़्ल पीठ गदहे की ,

काम आता है फ़क़त बोझ की ढुलाई में ।।

आम ओ आसान हुई जाए दिन ब दिन अब तो ,

अब क़सम से न रहा लुत्फ़ आश्नाई में ।।

काट देते न ज़ुबाॅं तुम हमारी जो पहले ,

हमको मिलती न महारत क़लम घिसाई में ।।

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 


Thursday, November 28, 2024

अंदाज़ ए बयाॅं

 











अंदाज़ ए बयाॅं मेरा न औरों सा और था !!

कहने का भी मुझमें न सलीका न तौर था !!

अल्फ़ाज़ असरदार न आवाज थी बुलंद ,

सच फिर भी किसी दौर में मेरा भी दौर था !!

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, October 22, 2024

चश्मा उतारकर देखो

 

नाव से और न पुल से बल्कि कभी , वो नदी तैर पारकर देखो ।।

ख़ुद पे जो गर्द का मुलम्मा है , वो खुरचकर बुहारकर देखो ।।

मन की ऑंखों से दूर से भी साफ़ , अपना दीदार वो कराता है ,

उसको जी भरके देखना हो तो , अपना चश्मा उतारकर देखो ।।

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, October 21, 2024

चश्मा

 

जलते हुए मरुस्थल लगते थे मुझको गीले ।।
गहरे से गहरे गड्ढे दिखते थे उॅंचे टीले ।।
सारे हरे - हरे ही चश्मे से दिख रहे थे ,
चश्मा उतारकर जब देखा तो सब थे पीले ।।
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 


Friday, October 4, 2024

मुक्तक

 दरारों से ज्यों वर्जित दृश्य ऑंखें फाड़ तकते हैं ।।

यों ज्यों कोई व्यक्तिगत दैनंदनी चोरी से पढ़ते हैं ।।

कि ज्यों कोई परीक्षा में नकल करने से डरता है ,

कुछ ऐसे ढंग से एकांत में हम उससे मिलते हैं ।।

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, September 17, 2024

ग़ज़ल

 


लगे सूरत से बस मासूम वैसे ख़ूब शातिर है ।।

वो दिखता पैरहन से भर मुसल्माॅं वर्ना काफ़िर है ।।

तुम्हें लगता नहीं करता वो ऐसे-वैसे कोई काम ,

हक़ीक़त में वो बस ऐसे ही कामों का तो माहिर है ।।

मेरी नज़रों में ऐसा ख़ुदग़रज़ अब तक नहीं आया ,

जो जब भी कुछ करे तो बस करे अपनी ही ख़ातिर है ।।

वो इक चट्टान का लोहे सरीखा था कभी पत्थर ,

मैं हैराॅं हूॅं वही गुमनाम अब मशहूर शाइर है ।।

किसी सूरत में उसका दिल न मुझ पर आएगा फिर भी ,

मेरा ये दिल उसी उस पर चले जाने को हाज़िर है ।।

वो रोज़ाना इरादा भागने का शहर का  करता ,

ये उस जंगल के गीदड़ का यक़ीनन वक़्त ए आख़िर है ।।

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 


Sunday, September 15, 2024

ग़ज़ल

 









न होता तू कोई अजगर घिसटता केंचुआ होता ।।

तेरे पीछे हिलाता दुम न फिर मैं घूमता होता ।।

जो तू होता बला का ख़ूबसूरत तो यक़ीनन बस ,

तुझे कैसे करूॅं हासिल यही सब सोचता होता ।।

न होती तुझको दिलचस्पी मेरी बातों में तो तुझसे , 

मुख़ातिब होता भी तो लब न अपने खोलता होता ।।

अगर हक़ दे दिया होता मुझे दीदार का तूने ,

तो क्यों छुपकर दरारों से तुझे मैं देखता होता ।।

न दी होती जो तूने बद्दुआ बर्बाद होने की ,

मैं क्यों आकर किनारे पर नदी के डूबता होता ?

न बदले होंगे तेरे वो बुरे हालात ही वर्ना ,

अभी तक तो तू सच मिट्टी से सोना बन गया होता ।।

न की होती जो तूने दम ब दम धोखाधड़ी मुझसे ,

मैं अपनी ज़िंदगी रहते न तुझे बेवफ़ा होता ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, September 12, 2024

ग़ज़ल

 

ग़म न उतना उनके दिल से दूर होने का हुआ ।।

ऑंख से गिरके जो चकनाचूर होने का हुआ ।।

अपने आज़ू-बाज़ू वाले ही न पहचानें हैं जब ,

फिर कहाॅं मतलब कोई मशहूर होने का हुआ ?

एक उम्दा बन गया शा'इर यही बस फ़ाइदा ,

इश्क़ में उनके मेरे रंजूर होने का हुआ ।।

और कुछ होता तो शायद मैं नहीं बनता शराब ,

मेरा ये अंजाम तो अंगूर होने का हुआ ।।

ख़ाकसारी ने किया जितना मेरा नुकसान सच ,

उससे बेहद कम मुझे मग़रूर होने का हुआ !!

जो न करना था किया , पाना था जो वो खो दिया ,

इस क़दर घाटा मेरे मजबूर होने का हुआ ।।

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 

 


Sunday, September 8, 2024

ग़ज़ल

 


                                    बड़े प्यार से प्यार अगर कीजिएगा , 

तो पल भर नहीं उम्र भर कीजिएगा।।

ख़ुदारा ख़बर कुछ भी उनकी मिले तो ,

मुझे सबसे पहले ख़बर कीजिएगा ।।

बमुश्किल निकाला है तुमको नज़र से ,

न हॅंसते हुए दिल में घर कीजिएगा ।।

नहीं चाहकर भी तुम्हें चाह बैठूॅं ,

कुछ अपना यूॅं मुझ पर असर कीजिएगा ।।

भले सख़्त नफ़रत से लेकिन क़सम से ,

कभी मेरी जानिब नज़र कीजिएगा ।।

चिकनाई पर से गुज़रना पड़े तो ,

कभी पाॅंव अपने न पर कीजिएगा ।।

मिली है जो रो-रो के ये ज़िंदगी तो ,

इसे हॅंसते-हॅंसते बसर कीजिएगा ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, August 24, 2024

मुक्तक

 











नहीं होता कमीनों में कमीनापन वो जो होता ,

ज़माने के चुनिंदा और मुट्ठी भर शरीफ़ों में ।।

जवानों में भी जो बातें अकेले में नहीं होतीं ,

तुम्हें मालूम क्या ? होतीं हैं क्या बातें ख़रीफ़ों में ।।

न लग जाए नज़र ; कितने ही ऐसा सोचकर अक्सर ;

ख़ुशी में भी दिखें यों ज्यों अभी बिजली गिरी उनपर ;

मैं दावा कर रहा हूॅं ; हाॅं ! भरा होता है बेहद ग़म ,

बला के मस्ख़रों में भी , कई यों ही ज़रीफ़ों में ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

( मस्ख़रा=काॅमेडियन/ख़रीफ़=बूढ़ा /ज़रीफ़=खुशमिज़ाज )


Wednesday, August 21, 2024

ग़ज़ल

 











मेरा पागल हो ख़ुशी से झूम जाना हो ।।

जब भी रेगिस्तान में बारिश का आना हो ।।

वैसे चाहे कोई गाए या न गाए पर ,

हाॅं ! नहाते वक़्त सबका गुनगुनाना हो ।।

मैं ज़ुबाॅं अपनी न काटूॅं , होंठ भर सी लूॅं ,

जब किसी को कुछ नहीं मुझको बताना हो ।।

सर झुका चुप उनके आगे बैठ जाता बस ,

हाल ए दिल अपना उन्हें जब भी सुनाना हो ।।

मैं मुसीबत में नहीं लेता मदद उससे ,

मुझसे अपने दोस्त का कब आज़माना हो ?

लोग कहते हैं कि अक्सर टूट जाते हैं ,

इसलिए मुझसे न ख़्वाबों का सजाना हो ।।

राह चलते लूट लूॅं मैं ऑंख का काजल ,

लेकिन उनके दिल का मुझसे कब चुराना हो ?

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 


Monday, August 19, 2024

ग़ज़ल

 











जाने क्यों ? पर बना लिया मैंने ।।

ख़ुदको पत्थर बना लिया मैंने ।।

क्या कहूॅं ? हिर्स में उन्हें अपने ,

पाॅंव से सर बना लिया मैंने ।।

इस क़दर लाज़िमी था सो ख़ुदको ,

गिरवी धर घर बना लिया मैंने ।।

नींद में एक सख़्त पत्थर को ,

नर्म बिस्तर बना लिया मैंने ।।

चाहता था बनूॅं क़लम ही पर ,

ख़ुदको ख़ंजर बना लिया मैंने ।।

उसको पाना था इसलिए ख़ुदको ,

उससे बेहतर बना लिया मैंने ।।

तीर ओ तलवार को मिटा यों ही ,

एक ज़ेवर बना लिया मैंने ।।

जब न इंसाॅं मिले तो साॅंपों को ,

दोस्त अक्सर बना लिया मैंने ।।

एक बेरोज़गार मालिक को ,

अपना नौकर बना लिया मैंने ।।

जल्दबाज़ी में ख़ुद से बहके को ,

अपना रहबर बना लिया मैंने ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, August 17, 2024

मुक्तक











मेरे होकर मोहब्बत में कभी पागल नहीं आए ।।

न धुल पाए किसी पानी से वो काजल नहीं लाए ।।

है कबसे मौसम ए ग़म मेरे दिल में छा रहा फिर भी ,

अभी तक ऑंसुओं के ऑंख में बादल नहीं छाए ?

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 




Monday, August 12, 2024

मुक्तक

 











मैं तकता रहा राह उसकी बताई ।।

बुलाया था उसने मगर ख़ुद न आई ।।

कई शामें अपनी गयीं इस तरह भी ,

न पीयी गई और न उसने पिलाई ।।

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...