Tuesday, May 7, 2024

ग़ज़ल

 यों वो ज़िंदगी में मेरी कब न था ?

मगर ये भी है वो ही वो सब न था ।।

चलाता था जो हुक़्म मुझ पर मेरा ,

वो मेहबूब था मेरा साहब न था !!

ये क़ब्ज़ा जो उसका मेरे दिल पे है ,

मिला था वो पहली दफ़्आ तब न था ।।

दिल-ओ-जाॅं से करता था मैं प्यार उसे ,

था सब कुछ वो मेरा मगर रब न था ।।

अगर चाहता चाह लेता उसे ,

बदन इतना भी उसका बेढब न था ।।

न मतलब रखा उसने मुझसे कभी ,

उसे जब तलक मुझसे मतलब न था ।।

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 

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