ख़ूबसूरत जो यार होते हैं ;
दिल
चुरा के फ़रार होते हैं ॥1॥
तीर
चल जाएँ फिर कहाँ रुकते ,
आर होते
या पार होते हैं ॥2॥
हमपे
होते नहीं जो क़ुर्बां हम ,
उनपे
अक्सर निसार होते हैं ॥3॥
रातें
होती हैं सच वहाँ दिन सी ,
और शब
से नहार होते हैं ॥4॥
सच में
होते हैं वो जो ताक़तवर ,
मुँह
के वो ख़ाकसार होते हैं ॥5॥
उन से
होते हैं लोग गिनती के ,
अपने
जैसे हज़ार होते हैं ॥6॥
शक्लो
सूरत के ताज सच पूछो ,
दिल
में कच्ची मज़ार होते हैं ॥7॥
कोई
बतलाए कैसे रातों रात ,
बैलगाड़ी
से कार होते हैं ?8॥
होने
को क्या न होवे दुनिया में ,
गाय
के सिंह शिकार होते हैं ?9॥
उन पे
क्या एतबार पापड़ से ,
जिनके
क़समो क़रार होते हैं ?10॥
वो भी
चलते हैं रुक नहीं जाते ,
जिनकी
राहों में ख़ार होते हैं ॥11॥
हुस्न
पे उनके इक दफ़ा न फ़िदा ,
सब के
दिल सौ सौ बार होते हैं ॥12॥
उनके तोहफ़े हों झोपड़ी
से पर ,
ताज
से यादगार होते हैं ॥13॥
साथ
उनके खजाँ के मौसम भी ,
सच में
फ़स्ले बहार होते हैं ॥14॥
उनकी
ठोकर से मीठे दर्या भी ,
सूखकर
रेगज़ार होते हैं ॥15॥
( शब = रात , नहार = दिन , ख़ाकसार = विनम्र , ख़ार = काँटा , खजाँ = पतझड़ , रेगज़ार
= मरुस्थल )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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