Sunday, August 3, 2014

मुक्तक : 594 - इक सिवा उसके कहीं


इक सिवा उसके कहीं दिल आ नहीं सकता ॥
है ये पागलपन मगर अब जा नहीं सकता ॥
क्या करूँ मज्बूर हूँ अपनी तमन्ना से ?
फिर भी तो चाहूँ उसे जो पा नहीं सकता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, August 2, 2014

150 : ग़ज़ल - दोस्त कब सौ हज़ार.........


दोस्त कब सौ हज़ार करना है ?
इक दो बस ग़म गुसार करना है ॥
जिनसे नज़रें मिलाना हो मुश्किल ,
उनसे आँखों को चार करना है ॥
इस ज़माने में बस मोहब्बत के ,
और सब कुछ उधार करना है ॥
सब कहें प्यार और वो भी हम ,
अब तो हमको भी प्यार करना है ॥
ख़ुद को चाहे न हम सुधार सकें ,
दूसरों का सुधार करना है ॥
एक सुख की किनार पाने को ,
कितने दुक्खों को पार करना है ?
ज़िंदगी को चलाए रखने को ,
कोई तो रोज़गार करना है ॥
बाद मरने के भी रहें ज़िंदा ,
काम कुछ यादगार करना है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, July 31, 2014

मुक्तक : 593 - यूँ ही सी नहीं कोई


यूँ ही सी नहीं कोई मुसीबत से सामना ॥
करता हूँ नई रोज़ अज़ीयत से सामना ॥
यूँ भी न समझ दर्द उठाता हूँ हो खफ़ा ,
करता हूँ तह-ए-दिल से , तबीअत से सामना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, July 30, 2014

मुक्तक : 592 - इक बार हमने सचमुच



इक बार हमने सचमुच इतनी शराब पी थी ॥
इक घूँट में दो प्यालों जितनी शराब पी थी ॥
यारों का दोस्ती की सर पर क़सम था धरना ,
फिर होश ना रहा कुछ कितनी शराब पी थी ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, July 29, 2014

मुक्तक : 591 - घूँट दो घूँट भरते भरते


घूँट दो घूँट भरते भरते फिर पूरा भर भर रिकाब पीने लगे ॥
आबे ज़मज़म के पीने वाले हम धीरे धीरे शराब पीने लगे ॥
दर्दो तक्लीफ़ के पियक्कड़ थे पर तेरा हिज्रे ग़म न झेल सके ,
पहले पीते थे बाँधकर हद को बाद को बेहिसाब पीने लगे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, July 27, 2014

149 : ग़ज़ल - मुझे ग़म देने वाले


मुझे ग़म देने वाले अब ख़ुशी तुम भी न पाओगे ॥
मुझे यूँ मारकर तुम भी ज़ियादा जी न पाओगे ॥
किसी की तड़पनों की दिल्लगी तुमने उड़ाई है ,
मगर हर दिल्लगी इतनी कभी सस्ती न पाओगे ॥
दिलों को तोड़ने का खेल अब तुम बंद भी कर दो ,
किसी की आह लेकर हर घड़ी मस्ती न पाओगे ॥
मेहरबाँ वक़्त है उड़ लो ख़फ़ा हो जाए फिर क्या हो ,
तरस जाओगे चलने को कहीं धरती न पाओगे ॥
मैं कर दूँगा तुम्हें मज्बूर जीने के लिए इतना ,
कि मरना चाहकर भी ज़ह्र को तुम पी न पाओगे ॥
ये माना शह्र बेहद ख़ूबसूरत है तुम्हारा ये ,
मगर बेशक़ हमारे जैसी भी बस्ती न पाओगे ॥
सिला यूँ ही बुरा मिलता रहा अच्छाइयों का गर ,
यक़ीनन हममें आइंदा तुम अच्छाई न पाओगे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, July 25, 2014

148 : ग़ज़ल - उसका जीवन सुधर गया


उसका जीवन सुधर गया होता ॥
मरने से कुछ ठहर गया होता ॥
तैरना जानता तो बिन कश्ती -
और पर बिन भी तर गया होता ॥
मुझसे वो बोलते तो मुश्किल क्या ,
ग़ैर मुमकिन भी कर गया होता ॥
ज़िंदगी से न तंग होता तो ,
मौत से मैं भी डर गया होता ॥
मैं भी परदेश से दिवाली पर ,
काश ! होता तो घर गया होता ॥
पोल उसकी न खुल गई होती ,
क्यों वो दिल से उतर गया होता ?
तह में सूराख़ उस घड़े की था ,
वर्ना बारिश में भर गया होता ॥
ब्रह्मचारी था वर्ना वो तुझपे ,
तुझको तकते ही मर गया होता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...