Friday, August 9, 2024

ग़ज़ल

 











कभी मैं ऊगता ; ढलता दिखाई देता हूॅं ।।

कभी थमा भी फिसलता दिखाई देता हूॅं।।

कुछ इस क़दर है मुझे भागदौड़ की आदत ,

खड़ा हुआ भी मैं चलता दिखाई देता हूॅं ।।

बची न मुझमें कहीं आग अब तो राख हूॅं मैं ,

भले ही शक्ल से जलता दिखाई देता हूॅं ।।

चला गया वो मेरा हाथ छोड़कर जबसे ,

मैं तबसे हाथ ही मलता दिखाई देता हूॅं ।।

मैं जल रहा हूॅं , मैं पत्थर ही हो रहा हूॅं पर , 

सभी को मोम पिघलता दिखाई देता हूॅं ।।

हूॅं जिनकी ऑंख का काॅंटा न जाने क्यों सबको ,

उन्हीं के दिल में मैं पलता दिखाई देता हूॅं ।।

मैं मारा-मारा फिरूॅं लेकिन उनको खा-पीकर ,

ख़ुशी से रोज़ टहलता दिखाई देता हूॅं ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, August 4, 2024

ग़ज़ल

 

सभी के साथ में उस दिन , सताने वो भी आए थे ।।
हमें मक़्तूल से क़ातिल , बनाने वो भी आए थे ।।
न जाने क्यों ; मगर जो चाहते थे हम मरेंगे कब ?
हमारी लाश पर ऑंसू , बहाने वो भी आए थे ।।
कई दुश्मन हमें बर्बाद करने पर तुले थे पर ,
बदलकर भेस को अपने , मिटाने वो भी आए थे ।।
फ़क़त हम ही न पहुॅंचे थे क़रीब उनके न आने को ,
हमारे पास आकर फिर , न जाने वो भी आए थे ।।
हमारे जख़्मों पे दुनिया तो लाई थी नमक मलने ;
अरे ! मरहम की जा मिर्ची , लगाने वो भी आए थे ।।
हमारे दिल को भूना सबने मिलकर , ग़म न माशा भर ,
मलाल इसका है मन-मन भर , जलाने वो भी आए थे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति





Saturday, July 27, 2024

मुक्तक

 


ताज़े को फेंक खाते हम लुत्फ़ लेके बासा ।।

बारिश में भीगते पर रखते हैं ख़ुद को प्यासा ।।

कोई कमी नहीं है , ये तो है अपनी मर्ज़ी ,

सब ख़ुद लुटाके फिरते हाथों में पकड़े कासा ।।

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, July 26, 2024

ग़ज़ल

 


डर है मिट जाऍं न पड़कर सख़्त ग़ुर्बत में ।।
इस क़दर बेकार हैं ; हैं इतनी फ़ुर्सत में ।।
हम मोहब्बत में बने थे , इसमें क्या शक़ है ?
पर मिटे भी हैं तो पड़कर हम मोहब्बत में ।।
सख़्त प्यासे हों तो आता है मज़ा जितना -
पानी पीने में ; न आता है वो शर्बत में ।।
हूॅं तो मैं तेरी मोहब्बत में पड़ा लेकिन ,
देखकर लगता मुझे जैसे हूॅं वहशत में ।।
बा-ख़ुदा मैं कब था खुशबूदार फूलों सा ,
अब महकने लग गया हूॅं तेरी सोहबत में ।।
सच कहूॅं तो मैं था कब लायक तुम्हारे पर ,
तुम लिखे थे रब के हाथों मेरी क़िस्मत में ।।
तब भी भाती थी मुझे तनहाई जब तुम थे ,
अब न तुम तब भी मज़ा क्यों आए ख़ल्वत में ?
-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, July 23, 2024

ग़ज़ल

 











मुझे भर भिगोने तू बारिश न आना ।।

ज़माने को भी तर-ब-तर करते जाना ।।

मुझे भी पता है तेरे दिल में मेरा ,

न था और न है और न होगा ठिकाना ।।

हो कितनी भी फ़ुर्सत अगर मैं बुलाऊॅं ,

न चाहे तू मुझको तो अब फिर न आना ।।

अभी तुझको पाने का सोचा नहीं है ,

यूॅं ही तुझको पा लूॅंगा गर मैंने ठाना ।।

तेरे वास्ते मुझको मुश्किल न होगा ,

अरे ! चाॅंद-तारों को भी तोड़ लाना ।।

उसे मारकर अब मेरी ज़िद है मुझको ,

ख़ुद अपने ही हाथों अभी ज़ह्र खाना ।।

उसे देखना भी गवारा नहीं अब ,

कभी आर्ज़ू थी उसी उसको पाना ।।

तुम्हीं ज़िंदगी थे तुम्हीं चल दिए अब ,

मुझे ख़ुद को मरने से होगा बचाना ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, July 14, 2024

ग़ज़ल

 


कहा करती हैं जो ऑंखें हमारे लब नहीं कहते ।।

बहुत खुलते हैं लेकिन कोई सूरत सब नहीं कहते ।।

लिखा करते थे ताबड़तोड़ जब लिखना न आता था ,

ग़ज़ल होती है क्या समझे हैं जब से अब नहीं कहते ।।

कहा करते हो तुम बेशक़ हमेशा बात अच्छी ही ,

मगर कहना हो वो जिस वक़्त उसको तब नहीं कहते ।।

कहा करते हैं जो बेढब जिसे देखो उसे बेढब ,

वही आईने से भी ख़ुदको टुक बेढब नहीं कहते ।।

कई हैं अपने पत्थर के सनम को जो ख़ुदा बोलें ,

मगर माॅं-बाप को इक बार अपना रब नहीं कहते ।।

वो तब-तब मान जाते हैं बुरा उनकी बुरी सूरत ,

जिसे हम चौदहवीं के चाॅंद सी जब-जब नहीं कहते ।।

वो कहते हैं कि हम उनको कहें अपना ख़ुदा मुॅंह पर ,

जिन्हें हम दिल में शैतान-ओ-बला कब-कब नहीं कहते ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, July 11, 2024

ग़ज़ल

 हैं इक वो , पीक जिनको , ख़ून की उल्टी दिखाई दे ।।

यहाॅं मुझको , लहू भी , साॅस या चटनी दिखाई दे ।।

हरा चश्मा पहनने की , मुझे इतनी रही आदत ,

कि हल्दी भी मुझे अब तो , हरी मिर्ची दिखाई दे ।।

मोहब्बत में , मैं तुलसीदास से , कुछ कम नहीं पड़ता ,

कहूॅं कैसे कि नागिन भी , मुझे रस्सी दिखाई दे ?

मैं उसका क़द कुछ ऐसे नापता हूॅं अपनी ऑंखों से ,

कि वो बौनी , मुझे मुझसे , कुछ ऊॅंची ही दिखाई दे ।।

मैं भिड़ जाता हूॅं , अपने से भी ताक़तवर से , जब मुझको ,

कभी ग़ुस्से में , भूखी शेरनी , बकरी दिखाई दे ।।

भरा हो पेट , तो लड्डू भी , मिट्टी का लगे लौंदा ,

रहूॅं भूखा , तो हर गोलाई , इक रोटी दिखाई दे ।।

अमूमन सबको , माशूक़ा में , दिखता है ख़ुदा अपना ,

मुझे क्यों , अपनी महबूबा में , बस लड़की दिखाई दे ?

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 

( पीक=पान का लाल थूक / साॅस=टोमेटो केचप ,लाल चटनी / अमूमन=प्रायः )

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...