Wednesday, May 11, 2016

मुक्तक : 832 - जाना है किधर को ?



छूना है शाम को या पकड़ना है सहर को ;
हमको नहीं पता था कि जाना है किधर को ?
जब तक थे पाँँव चलते रहे , चलते रहे हम ,
कटने के बाद भी था रखा जारी सफ़र को ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, May 10, 2016

मुक्तक : 831 - रक्त का चूषक



स्वच्छ-कर्ता को महा दूषक बना देता ॥
दुग्धप्रिय को रक्त का चूषक बना देता ॥
सिर-मुकुट को पाँव की चप्पल बना डाले ,
काल क्षण में हस्ति को मूषक बना देता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, May 9, 2016

गीत : 43 - भारी बारिश में धू-धू जल बैठीं ॥

सूखे पत्तों में जैसे झट से आग लग जाए ।
पतला कागज़ तनिक सी देख लौ सुलग जाए ।
मेरी जितनी भी कामनाएँ थीं ,
भारी बारिश में धू-धू जल बैठीं ॥
जैसे पानी में होता हाल कच्ची मिट्टी का ।
अश्रु गिरने से अपने प्राण-प्रिय की चिट्ठी का ।
जो लगाती थीं पार मुझको वो ,
सारी नौकाएँ आज गल बैठीं ॥
जैसे कुछ और वो नहीं हों मेरी छाया हों ।
गिरती दीवार को सम्हालता वो पाया हों ।
साथ में बैठती जो घंटों थीं ,
आज मनुहार पे न पल बैठीं ॥
सच में आजन्म का था , था नहीं क्षणिक मुझको ।
जिनपे विश्वास हाँ स्वयं से भी अधिक मुझको ।
मेरे मित्रों के साथ में मिल वो ,
मेरी सखियाँ भी मुझको छल बैठीं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, May 8, 2016

मुक्तक : 830 - नाग की तरह ॥



डसती थी याद दिल को स्याह नाग की तरह ॥
जलता था तन ये जंगलों की आग की तरह ॥
तेरे बिना थी ज़िंदगी बग़ैर आब की ,
इक अंधी बावड़ी , बड़े तड़ाग की तरह ॥
( स्याह=काला ,बग़ैर आब की=जल विहीन ,अंधी बावड़ी=सीढ़ीयुक्त बहुत गहरा कुआँ ,तड़ाग=तालाब ,सरोवर )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, May 3, 2016

मुक्तक : 829 - मान जाना रे.....



मान जाना रे किसी दिन न भी मनाने पर ॥
ख़ुद चले आना रे मेरे न भी बुलाने पर ॥
कम से कम तब तो मेरी बात मान जाना रे ,
जब पहुँच जाऊँ रे मैं क़ब्र के मुहाने पर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, May 2, 2016

मुक्तक : 828 - अजगर बड़ा ॥



एक चूहे के लिए छोटा सा भी अजगर बड़ा ॥
ज्यों किसी हाथी को भी हो शेर-ए-बब्बर बड़ा ॥
ख़ूब सुन-पढ़ के भी जो हमने कभी माना नहीं ,
इश्क़ में पड़कर वो जाना , है ये गारतगर बड़ा ॥
( शेर-ए-बब्बर = बब्बर शेर , गारतगर = विनाश करने वाला )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, May 1, 2016

मुक्तक : 827 - किंचित बड़े न बोल ॥




मुँह से कभी निकालता किंचित बड़े न बोल ॥
करता नहीं हूँ मैं कभी भी बात गोल-मोल ॥
रखता हूँ अपना एक-इक डग भी मैं फूँक-फूँक ,
कहता हूँ वाक्य-वाक्य में मैं शब्द तोल-तोल ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...