Saturday, May 16, 2015

मुक्तक : 711 - जुगनू हज़ार दो ॥


टिम-टिम चिराग़ एक या जुगनूँ हज़ार दो ॥
हंसों सा दो प्रकाश कि पिक-अंधकार दो ॥
वाबस्ता जो नज़र से वो किस काम का मेरे ?
अंधा हूँ मैं मुझे क्या ? दो शब या नहार दो ॥
( वाबस्ता=सम्बद्ध  / नहार=प्रभात )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, May 15, 2015

मुक्तक : 710 - जन्मा इक किन्नर ने बच्चा !


जो गप्पी लोगों को देता फिरता गच्चा ॥
कैसे मानलूँ है इस बार वो सचमुच सच्चा ?
ढोल जो पीट मुनादी करता फाड़ गले को ,
हट्टा-कट्टा जन्मा रे किन्नर ने बच्चा !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, May 14, 2015

मुक्तक : 709 - कैसा मैं परिंदा था ?



जाने कितनों में मैं अजीब औ' चुनिंदा था ?
उम्र भर फड़फड़ा , घिसट-घिसट भी ज़िंदा था॥
तोड़ पिंजरा सका न , चल सका न , उड़ पाया ;
पैर थे , पर थे , हाय ! कैसा मैं परिंदा था ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Thursday, May 7, 2015

मुक्तक : 708 - बस मोहब्बत ही करूँ ॥


ना कहीं चुगली तेरी ना तो शिकायत ही करूँ ॥
मारना चाहूँ मगर पूरी हिफ़ाज़त ही करूँ ॥
क़ाबिले नफ़्रत है तू लेकिन कहूँ कैसे मेरी ,
बेबसी ऐसी है तुझको बस मोहब्बत ही करूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Wednesday, May 6, 2015

मुक्तक : 707 - बाज का भी बाप ॥


जिस्म से ले रूह तक की , की है हमने माप सच ॥
आदमी क्या हो ? बताएँगे हमें क्या आप सच ?
दिखने में गौरैया ,मैना ,फ़ाख़्ता ,बुलबुल  ,
अस्ल में है गिद्ध ,चील औ’ बाज़ का भी बाप ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, May 4, 2015

मुक्तक : 706 ( B ) - नुकीले-नुकीले ये काँटे


कोई करके न तरफ़दारियाँ है ये बाँटे ।।
कोई अपने ही न हाथों से ख़ुद है ये छाँटे ।।
ख़ुद-ब-ख़ुद ही ये गिरें आके नर्म-दामन में ,
बदनसीबी से नुकीले-नुकीले ये काँटे ।।
( तरफ़दारियाँ=पक्षपात, छाँटना=चुनना )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, May 3, 2015

मुक्तक : 706 - क़ैद-ओ-क़फ़स


मत घोंसले को क़ैद-ओ-क़फ़स का तू नाम दे ॥
मत गुफ़्तगू को तल्ख़ बहस का तू नाम दे ॥
करता हूँ मैं जो उससे दिल-ओ-जान से रे उस ,
पाकीज़ा इश्क़ को न हवस का तू नाम दे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...