Sunday, November 10, 2013

मुक्तक : 370 - ज़रूर मेरी सोच


ज़रूर मेरी सोच कुछ अजीब लगती है ।।
ग़लत , फिज़ूल , किज़्ब के क़रीब लगती है ।।
मगर यकीं है हादसों की वज़्ह कितनी दफ़्आ ,
मुझे नसीब , नसीब और नसीब लगती है ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 369 - उसकी जिह्वा अति कटुक


उसकी जिह्वा अति कटुक अति तिक्त है ॥
पूर्णतः मधु-खांड रस से रिक्त है ॥
पूछने पर क्यों ? तो वह कहता है यह -
दुःख से वह आपाद-मस्तक सिक्त है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, November 9, 2013

मुक्तक : 368 - पेशानी पे चन्दन - तिलक



पेशानी पे चन्दन-तिलक लगा रहे हो तुम ।।
क्या दिल के कालेपन को यों छिपा रहे हो तुम ?
क्या हो गया है पाप कोई ? बार-बार जा ,
गंगा में कभी जमुना में नहा रहे हो तुम ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, November 8, 2013

मुक्तक : 367 - ये किसकी उसपे



ये किसकी उसपे यक-ब-यक पड़ी रे बद निगाह ?
ये किसकी लग गई रे उसको हाय - हाय आह ।।
दम दे के ही हुई वो जो ख़्वाब की तामीर ,
बा नामो-निशां दम के दम गिरी हुई तबाह ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, November 7, 2013

मुक्तक : 366 - बड़े अदब ब क़ाइदा


बड़े अदब ब क़ाइदा बहुत करीने से ।।
कभी दीवारो दर से टिक तो गाह ज़ीने से ।।
न आज उसे रहे पहचान भी जिसे कल तक ,
हज़ार बार लगाया था अपने सीने से ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, November 6, 2013

मुक्तक : 365 - दीवान था लाज़िम


दीवान था लाज़िम तुम्हें मैं सिर्फ़ शे’र था ।।
तालिब गुलाब के थे तुम मैं बस कनेर था ।।
फ़िर भी तुम्हारे दिल पे की बेख़ार-हुक़ूमत ,
बेशक़ ये सब नसीब का ही हेर-फेर था ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, November 5, 2013

मुक्तक : 364 - चाहे वो कितने ऊँचे ही


( चित्र Google Search से साभार )
चाहे वो कितने ऊँचे ही ब्राह्मण हों या हों आर्य ?
शिक्षक का सुनिश्चित है सबको विद्यादान कार्य ।।
यदि एकलव्य जैसे सभी ठानने लग जाएँ ,
हो जाएँगे औचित्यहीन सारे द्रोणाचार्य ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...