Monday, November 4, 2013

घनघोर अमा-निश में..........



घनघोर अमा-निश में 
उजाली की तरह है ॥
अपमान  की कालिख में 
तू लाली की तरह है ॥
संतों के वास्ते है तू 
तरने को नाव सी 
मधु-कैटभों को दुर्गा की ,
काली की तरह है ॥
[ अमा-निश =अमावस्या की रात ,उजाली =चाँदनी ,लाली =इज़्ज़त ]

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 363 - प्रत्येक पल उसी


प्रत्येक पल उसी उसी का नाम लिया है ।।
जीवन ही समर्पित उसी के नाम किया है ।।
पशु से मनुष्य मुझको बनाकर के जगत में ,
इक देवता का मुझको जिसने नाम दिया है ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, November 3, 2013

मुक्तक : 362 - छोटे से सिर पे


छोटे से सिर पे पत्थरों का इक पहाड़ है ।।
ताउम्र को ये ज़िंदगी क़ैदे तिहाड़ है ।।
मातम है मसर्रत भी तेरे बिन मेरे लिए ,
हर खिलखिलाता बाग़ सिसकता उजाड़ है ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, November 2, 2013

108 : ग़ज़ल - दुश्मन का देख ठाठ



दुश्मन का देख ठाठ-बाट जल रहा हूँ मैं ॥
वो अर्श पर उड़े ज़मीं पे चल रहा हूँ मैं ॥
गिरते नहीं गिराए से भी लोग जिस जगह ,
उस खुरदुरी ज़मीन पर फिसल रहा हूँ मैं ॥
जब तक लचक थी हड्डियों में मैं नहीं झुका ,
अब सख़्त हैं तो झुकने को मचल रहा हूँ मैं ॥
हालात ने कुछ इस तरह बदल दिया मुझे ,
हालात अपने आजकल बदल रहा हूँ मैं ॥
बेहाल हूँ मैं अपने दर्द से यहाँ-वहाँ ,
मारे खुशी के यों नहीं उछल रहा हूँ मैं ॥
औंधे पड़ों को और लात मारता जहाँ,
खा-खा उसी की लातें तो सँभल रहा हूँ मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 361 - अपनी बदशक़्ली छिपाकर


अपनी बदशक़्ली छिपाकर ही ख़ुद को पेश करो ।।
क़ाबिले दीद बनाकर ही ख़ुद को पेश करो ।।
कौन तकता है ख़ूबसूरती-ए-रूह यहाँ ?
जिस्म भरपूर सजाकर ही ख़ुद को पेश करो ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, November 1, 2013

मुक्तक : 360 - जब देखो तब दिमाग़


जब देखो तब दिमाग़ यही करता है सवाल -
क्या इसको ही न बोलेंगे हम वक़्त-ए-जवाल ?
पहचानने से करने लगें अपने जब इनकार ,
कुछ ख़ैर-ख़बर लें न कभी पूछें हाल-चाल ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

जब देखो तब हाथ तंग.......................


जब देखो तब हाथ तंग जब देखो खींसा तब खाली ॥
तुम ही बोलो हमको कैसी धनतेरस औ’’ दीवाली ?
सट्टा ,जुआ ,लॉटरी हमने सब अजमाकर देख लिया ,
धनिकों में फिर फिर धन पहुँचा कंगलन फिर फिर कंगाली ॥
मालिक लोग चरागां करते फिरें ख़ुशी का हमको क्या ?
मजदूरों की क़िस्मत ख़ालिस ग़म की करना हम्माली ॥
गुड़ तक के लाले हैं कैसे बाँटें खील-बताशे हम ?
आज के दिन भी गुड़-गुड़ करता पेट ये अपनी बदहाली ॥
दीप, तेल, बाती, माचिस, फुलझड़ी, पटाखे लो उधार ,
किन्तु मनाओ दीवाली ये कैसी परंपरा साली ?
संवदिये ने बना दिया ऊँचा पहाड़ इक राई का ,
दीप जलाने वाले ने यों आतिशबाज़ी कर डाली ॥
सदियों सदी पुरानी रीतें मूल लापता है जिनका ,
ये कवि की करतूत है जो कर बैठा मुख को करमाली ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...