Sunday, May 12, 2013

मुक्तक : 206 - जैसे कि दिल


जैसे कि दिल लगा के किताबात तुम पढ़ो ,
कब मेरा हालेदिल मेरी आँखों में पढ़ोगे ?
मेरे तो रोम-रोम में रग-रग में बसे तुम ,
कब मुझको अपने दिल की पनाहों में रखोगे ?
जैसे कि नाम जपते हैं राधा का कन्हैया ,
रटती हैं राधिका भी किशन वंशीबजैया ,
मैं भी तुम्हें उन्हीं की तरह याद हूँ करता ,
क्या तुम भी मुझको ऐसे कभी याद करोगे ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 205 - इक शेर कहे



इक शेर कहे , इक मगरमच्छ , इक भेड़ कहे ॥
इक एक कहे , इक ढाई कहे , इक डेढ़ कहे ॥
कुछ और नहीं , सच इसके सिवा , है इश्क़ ख़ुदा ,
हम तुम बोलें , पशु-पक्षी कहें , चुप पेड़ कहे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 204 - ठाठ से शाही



ठाठ से शाही पलंग के नर्म गद्दों पर ॥
लोग करवट ही बदलते रहते है शब भर ॥
नींद आ जाए तो बिस्तर कौन तकता है ,
मैं तो खर्राटे लगाऊँ पेड़ पर चढ़कर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, May 11, 2013

89 : ग़ज़ल - मैं समझता था उन्हें



मैं समझता था उन्हें आह ! हक़ीक़त वाले ।।
झूठ थे , जितने थे ख़त उसके मोहब्बत वाले ।।1।।
देखने में तो मसीहा की तरह लगता था ,
काम करता था मगर सिर्फ़ सफ़ाहत वाले ।।2।।
बात करता था हमेशा ही वो जीने वाली ,
दिल में रखकर के ख़यालात क़यामत वाले ।।3।।
उसने तनख़्वाह दी आसान सहज कामों की ,
काम लेकर के बड़े सख़्त मशक़्क़त वाले ।।4।।
जिसके लायक़ था वही ओहदा उसने पाया ,
सारे क़ाबिल तो नहीं होते यों क़िस्मत वाले ।।5।।
पहले तो बख़्श ही देते थे ख़ता कैसी भी ,
आज दुनिया में कहाँ दोस्त मुरव्वत वाले ?6।।
अब जिरह मुझसे वो गूँगा भी बहुत करता है ,
उसमें तेवर न पनपते हों बग़ावत वाले ?7।।
छुपके करता था ; लिहाज़ अपना वो जब रखता था ,
अब तो आगे ही करे काम नदामत वाले ।।8।।
(सफ़ाहत=नीचता/कमीनापन , नदामत=लज्जा)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, May 10, 2013

मुक्तक : 203 - हँस हँसके



हँस-हँसके उसने कितनी बार आँख चार की ?
चाबी मगर न भूलकर दी दिल के द्वार की !!
माँगा कुछ उसने तोहफे में था न हमने ख़ुद ,
अपनी ये ज़िंदगानी उसके नाम यार की ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 202 - चाँद पे चढ़के


चाँद पे चढ़के समंदर में कूद पड़ जाऊँ ॥
कहके तो देखो मैं सूरज को भी बुझा आऊँ ॥
अपने दिल में जो बसाने का क़ौल दो मुझको ,
ग़ैरमुम्किन को भी मुम्किन बनाके दिखलाऊँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, May 9, 2013

मुक्तक : 201 - कभी दिल में


कभी दिल में हमें उनके ठिकाना रोज़ मिलता था ॥
जगह तकियों की बाहों का सिरहाना रोज़ मिलता था ॥
इधर कुछ रोज़ से क्या हाथ अपना तंग हो बैठा ,
नहीं मिलता कभी अब वो जो जानाँ रोज़ मिलता था ॥
(जानाँ=महबूब ,प्रेमपात्र)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...