जकड़ कर वो मुझसे उछल कह रहे हैं ।।
मेरे काटकर पैर चल कह रहे हैं ।।
क़लम क्या ज़रा सी लगे थामने बस ,
नहीं कुछ ग़ज़ल पर ग़ज़ल कह रहे हैं ।।
न जाने है क्या उसमें उसको जहाँ में ,
सिवा मेरे सब ही कँवल कह रहे हैं ?
मैं जैसा हूँ अच्छा हूँ लेकिन मुझे सब ,
जहाँ के मुताबिक़ बदल कह रहे हैं ।।
ज़रा भी न अब लड़खड़ाऊँ मैं फिर क्यों ,
अभी भी मुझे सब सँभल कह रहे हैं ?
अमीर अपने घर में ग़रीबी को घर से ,
बड़े ज़ोर चिल्ला निकल कह रहे हैं ।।
मेरी ; मेरे ; मेरे ही मुँह पर ग़ज़ब है ,
वफ़ादारियों को दग़ल कह रहे हैं !!
हुआ ख़ैरमक़्दम यूँ उनका मेरे घर ,
मेरी झोपड़ी वो महल कह रहे हैं ।।
ज़रा सा मैं उठने को क्या गिर गया हूँ ,
मरा वो मुझे आजकल कह रहे हैं ।।
सवालों पे मेरे , सवालों को अपने ,
वो मेरे सवालों का हल कह रहे हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
2 comments:
लाजवाब रचना।
स्वाद आ गए पढ़ कर।
आपका नई रचना पर स्वागत है 👉👉 कविता
शुक्रिया । रोहितास जी ।
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