Saturday, October 5, 2019

मुक्तक : 924 - इक रब मानते हैं


मत हो हैराँ जान कर बेदिल ये सच है ,
एक बस हम ही नहीं सब मानते हैं ।।
जो भी सच्चा प्यार करते हैं जहाँ में ,
इश्क़ को ही ज़ात-ओ-मज़हब मानते हैं ।।
और तो और इश्क़ जब हद पार कर ले ,
माने आशिक़ को ख़ुदा महबूबा उसकी ;
और आशिक़ लोग महबूबा को अपनी ,
तह-ए-दिल से अपना इक रब मानते हैं ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

3 comments:

Amar Adwiteey said...

बहुत सुंदर!

Amar Adwiteey said...

बहुत सुंदर!

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद । अमर अद्वितीय जी ।

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...