Thursday, April 18, 2013

मुक्तक : 169 - अपना सब जोड़ना है


अपना सब जोड़ना है जो भी कुछ है टूटा सा ॥
उसको हर हाल मनाना है जो है रूठा सा ॥
अपनी ख़ातिर तो जैसा हूँ मैं ठीक हूँ सचमुच ,
मुझको बनना है किसी के लिए अनूठा सा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, April 17, 2013

मुक्तक : 168 - मैंने तेरी नाचती


मैंने तेरी नाचती तस्वीर देखी है ॥
दिल में सर ऊँचा उठाती पीर देखी है ॥
वन में जैसे क़ैस ने देखा हो लैला को ,
राँझना ने मानो मरु में हीर देखी है ॥
( क़ैस=मजनूँ , मरु=रेगिस्तान )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 167 - रात-रात भर


रात-रात भर जाग जाग कर यों न भोर तू कर ॥
निर्निमेष मत अपनी दृष्टि आकाश ओर तू कर ॥
प्रीति सत्य और अति पुनीत है शंकहीन तेरी ,
व्यर्थ परिश्रम चंद्र प्राप्ति का मत चकोर तू कर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

मुक्तक : 166 - सब रामत्व विहीन



सब रामत्व विहीन मारने रावण आए ॥
रक्तबीज सा वह क्यों ना पुनि-पुनि जी जाए ॥
सचमुच हो जो रावण के वध का अभिलाषी ,
सर्वप्रथम वह स्वयं को  पूरा राम बनाए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 99 - कुछ होते रुपये


( चित्र Google Search से साभार )
कुछ होते रुपये होता कुछ दिमाग़ मेरे पास ॥
जिसको भी बुलाता वो आता भाग मेरे पास ॥
हो जाते झपकते ही पलकें मेरे सभी काम ,
होता जो अलादीन का चिराग़ मेरे पास ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 165 - इन लोगों का पेट


( चित्र Google Search से साभार )

इन लोगों का पेट जन्म से जैसे भरा नहीं है ॥
लगते हैं सारे मुर्दे पर कोई मरा नहीं है ॥
ये भुखमरी कुपोषण की है एक बानगी केवल ,
ऐसे लाखों दृश्य हैं जिनसे सूनी धरा नहीं है ॥
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 164 - मेरी आँखों को


मेरी आँखों को सुकूँ चैन-ओ-क़रार मिले ॥
मौत से पहले बस इक दीद तेरा यार मिले ॥
दुखता दिल राहत-ओ-आराम पा ही जाए अगर ,
बोसा होठों का गले बाजुओं का हार मिले ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...