Saturday, August 19, 2017

ग़ज़ल : 240 - आग से ठंडी



हँसना मत , हैराँ न होना देखकर मेरा जतन ।।
कर रहा हूँ आग से ठंडी जो मैं अपनी जलन ।।1।।
कैसे कर जाते हैं लोग इसकी बुराई या ख़ुदा ,
मुझको तो जैसा भी है लगता है जन्नत सा वतन ।।2।।
दिल नहीं चाँदी हो , सोना गर नहीं हो रूह तो ,
है वो ख़ुशबूदार फूलों से निरा खाली चमन ।।3।।
उनसे तुरपाई को माँगी थी मदद ले आये वो ,
तेग़ सूई की जगह धागे की जा मोटी रसन ।।4।।
नाज़ुकी में वो गुलाबी पंखुरी से नर्म है ,
और सख़्ती में है कोहेनूर सी वो गुलबदन ।।5।।
( हैराँ =चकित ,रूह =आत्मा ,निरा खाली =सर्वथा रिक्त ,तेग़ =तलवार ,जा =जगह ,रसन =रस्सी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, August 8, 2017

ग़ज़ल : 239 - मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ



मग़्ज़ की कब सिर्फ़ दिल की सुन रहा हूँ ।।
अनगिनत ख़्वाब उनको लेकर बुन रहा हूँ ।।1।।
हो गया हूँ आज मीठा पान उनका ,
जिनको कल तक प्याज औ’ लहसुन रहा हूँ ।।2।।
पूस का जाड़ा कभी तो जेठ की लू ,
मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ ।।3।।
मैं हमेशा ही नगाड़े की न ढम-ढम ,
घुंघरुओं की भी मधुर रुनझुन रहा हूँ ।।4।।
जो मिला चुपचाप उसी को रख लिया कब ,
अपनी मर्ज़ी से मैं कुछ भी चुन रहा हूँ ।।5।।
जिसको पाने जान तक की की न पर्वा ,
आज उसे ही पाके सिर को धुन रहा हूँ ।।6।।
जब से वो मेरी हिफ़ाज़त भूल बैठे ,
दाल , गेहूँ की तरह ही घुन रहा हूँ ।।7।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, July 27, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 873 - कच्ची मिट्टी



गलता बारिश में कच्ची मिट्टी वाला ढेला हूँ ॥
नेस्तोनाबूद शह्र हूँ मैं उजड़ा मेला हूँ ॥
देख आँखों से अपनी आके मेरी हालत को ,
तेरे जाने के बाद किस क़दर अकेला हूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, July 22, 2017

खुल के अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करता है



खुल के अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करता है ॥
सच के कहने को तू सौ बार शर्म करता है !!
जब तू बाशिंदा है घनघोर बियाबानों का ॥
क्यों तू मालिक है शहर में कई मकानों का ?
तुझसे सीखे कोई सौदागरी का फ़न आकर ॥
आईने बेचे तू अंधों के शहर में जाकर !!
दिल तिजोरी में करके बंद अपना बिन खो के ॥
इश्क़ करता तू यों सर्पों से नेवला हो के !!
लोमड़ी आके तेरे द्वार पे भरती पानी ॥
तेरा चालाकियों में दूसरा कहाँ सानी ?
तुझसा जीने का हुनर किसने आज तक जाना ?
मैंने उस्ताद अपना तुझको आज से माना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, July 13, 2017

ग़ज़ल : 238 - द्रोपदी न समझो ॥



बारिश में बहते नालों ख़ुद को नदी न समझो ।।
लम्हा तलक नहीं तुम ख़ुद को सदी न समझो ।।1।।
अच्छे के वास्ते गर हो जाए कुछ बुरा भी ,
बेहतर है उस ख़राबी को फिर बदी न समझो ।।2।।
दिखने में मुझसा अहमक़ बेशक़ नहीं मिलेगा ,
लेकिन दिमाग़ से मुझ को गावदी न समझो ।।3।।
पौधा हूँ मैं धतूरे का भूलकर भी मुझको ,
अंगूर गुच्छ वाली लतिका लदी न समझो ।।4।।
जिसको वरूँगी मेरा पति बस वही रहेगा ,
सीता हूँ मैं मुझे तुम वह द्रोपदी न समझो ।।5।।
(बदी = पाप , अहमक़ = भोंदू , गावदी = बेवकूफ़ )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, July 10, 2017

ग़ज़ल : 237 - दोपहर में रात



एक घटिया टाट से उम्दा वो मलमल हो गए ।।
हंस से हम हादसों में पड़के गलगल हो गए ।।1।।
हो गए शीतल सरोवर बूँद से वो और हम ,
रिसते - रिसते टप - टपकते तप्त मरुथल हो गए ।।2।।
शेर की थे गर्जना , सागर की हम हुंकार थे ,
आजकल कोयल कुहुक , नदिया की कलकल हो गए ।।3।।
पार लोगों को लगाने कल तलक बहते थे जो ,
अब धँसाकर मारने वाला वो दलदल हो गए ।।4।।
सच ; जो दिल की खलबली का अम्न थे , आराम थे ,
धीरे - धीरे अब वही कोहराम हलचल हो गए ।।5।।
इक ज़रा सी भूल से हम उनके दिल से हाय रे ,
दोपहर में रात के तारों से ओझल हो गए ।।6।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, July 8, 2017

ग़ज़ल : 236 - हिरनी जैसी आँखें



एक नहीं , दो भी छोड़ो झुण्डों के झुण्डों की ।।
मेरे चूहे निगरानी करते हैं शेरों की ।।1।।
जिनको आँखें रखकर भी कुछ सूझ नहीं पड़ता ,
मैं उनसे ज़्यादा इज़्ज़त करता हूँ अंधों की ।।2।।
तुम उनको बातों से अब समझाना बंद करो ,
सख़्त ज़रूरत है उनको घूँसों की लातों की ।।3।।
मुफ़्लिस का दीनो-ईमान न कुछ क़ीमत रखता ,
इस दुनिया में बात है तो बस दौलत वालों की 4।।
सब पाकर भी रहती अंधों बहरों की ख़्वाहिश ,
हिरनी जैसी आँखें , हाथी जैसे कानों की ।।5।।
ऊँची-ऊँची डिग्री रखती हैं जो साथ अपने ,
अक़्सर कम सुनतीं वो बहुएँ अनपढ़ सासों की ।।6।।
लाख तिजोरी ख़ाली हो पर फिर भी होती है ,
उसको सख़्त ज़रूरत मोटे पक्के तालों की ।।7।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...