Saturday, August 8, 2015

मुक्तक : 745 - दौड़ पड़ते हैं ॥




कभी हिरण से साथ-साथ दौड़ पड़ते हैं ॥
कभी नवीन अश्व जैसे हठ पे अड़ते हैं ॥
कभी-कभार कुत्ते-बिल्लियों से आपस में ,
दिलो-दिमाग़ ये मेरे झगड़ते-लड़ते हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Friday, August 7, 2015

मुक्तक : 744 - नहीं चाहता हूँ ॥



[ चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ] 
न सचमुच जहाँ के तहीं चाहता हूँ ॥
कहीं और भी मैं नहीं चाहता हूँ ॥
न जन्नत न दोज़ख में रहने की ख़्वाहिश ,
जहाँ वो रहें घर वहीं चाहता हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, August 6, 2015

मुक्तक : 743 - मेरा सच्चा ख़ैरख़्वाह


[ चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ] 

मुझको कितनी बार गिर जाने पे तूने ही उठाया !!
ख़ुदकुशी करने से मरने से मुझे तूने बचाया !!
हर दफ्आ साबित हुआ तू मेरा सच्चा ख़ैरख़्वाह ,
फिर भी क्यों  ? 'अपना है तू 'इसका यकीं अब तक न आया  !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Wednesday, August 5, 2015

मुक्तक : 742 - आबोदाना ॥



[ चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ] 
लिक्खा जहाँ पे होता क़िस्मत में आबोदाना ॥
ना चाह के भी सबको पड़ता वहाँ पे जाना ॥
मर्ज़ी का सबको मिलता कब रोज़गार याँ पे ?
भरने को पेट जैसा चाहें मिले न खाना ॥
(आबोदाना=रोज़ीरोटी,खाना=भोजन)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, August 4, 2015

मुक्तक : 741 - आफ़्ताब बनना है ॥


न पूछो मुझसे क्या मुझको जनाब बनना है ?
किसी से सह्ल नहीं सबसे सा’ब बनना है ।।
हँसो न गर तो अभी अपनी आर्ज़ू कह दूँ ?
चराग़ हूँ मैं मुझे आफ़्ताब बनना है !!
( सह्ल=सरल , सा’ब=कठिन ,आर्ज़ू=मनोकामना,आफ़्ताब=सूर्य )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, August 3, 2015

मुक्तक : 740 - जो बचा लेता ॥


टूटने - गिरने बिखरने से जो बचा लेता ॥
आँधियों में भी उजरने से जो बचा लेता ॥
उसको बोलूँ न ख़ुदा तो मैं और क्या बोलूँ ?
पीलूँ ज़हराब तो मरने से जो बचा लेता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, August 1, 2015

मुक्तक : 739 - अच्छा किया ॥


ठीक है मुझसे मुँह फेर तूने लिया ॥
आगे भी जो भी करना हो करना पिया ॥
चाहे करना बुरा किन्तु ऐसा लगे ,
साथ मेरे सदा तूने अच्छा किया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...