Saturday, September 13, 2014

मुक्तक : 598 - कहा करते हैं लो


कहा करते हैं लो इस हाथ उस से दो मोहब्बत ॥
हक़ीक़त में मगर जाने न क्या ये हो मोहब्बत ॥
नफ़ा-नुक़्सान का करके ख़याल अब के जहाँ में ,
तिजारत की तरह करते हैं लोग इश्क़ो-मोहब्बत ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 597 - यहाँ क्या और वहाँ क्या


यहाँ क्या और वहाँ क्या हर जगह पर याद आता है ॥
नहीं रुक - रुक के वो मुझको निरंतर याद आता है ॥
रहा करते थे जब उसमें तब उसकी क़द्र ना जानी ,
कि घर से दूर होकर अब बहुत घर याद आता है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, September 12, 2014

मुक्तक : 596 - उनसे मिलने मैं


उनसे मिलने मैं ख़ुद से छूट-छूट जाता हूँ ॥
उनसे जुड़ने को अपने आप टूट जाता हूँ ॥
मुझसे सचमुच में वो जो रूठ जाएँ तो उनसे ,
मैं मनाने को झूठ-मूठ रूठ जाता हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, September 11, 2014

मुक्तक : 595 - अपना मजहब छोड़


अपना मजहब छोड़ तेरा अपने सर मजहब किया ॥
रब को रब ना मानकर तुझको ही अपना रब किया ॥
होश में हरगिज़ न करते जो वो बढ़-बढ़ शौक़ से ,
हमने तेरे इश्क़ की दीवानगी में सब किया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Wednesday, September 10, 2014

151 : ग़ज़ल – ज़िंदगानी तबाह कर बैठे



ज़िंदगानी तबाह कर बैठे ।।
ख़ुदकुशी का गुनाह कर बैठे ।।1।।
हमको करना था आह-आह जहाँ ,
हम वहाँ वाह-वाह कर बैठे ।।2।।
जिसको दिल में बसा के रखना था ,
उससे टेढ़ी निगाह कर बैठे ।।3।।
अपना उजला सफ़ेद मुस्तक़्बिल ,
अपने हाथों ही स्याह कर बैठे ।।4।।
ऊबकर तीरगी से कुछ जुगनूँ ,
चाँद-सूरज की चाह कर बैठे ।।5।।
अक़्ल मारी गई थी दुश्मन से ,
दोस्ती की सलाह कर बैठे ।।6।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

Sunday, August 3, 2014

मुक्तक : 594 - इक सिवा उसके कहीं


इक सिवा उसके कहीं दिल आ नहीं सकता ॥
है ये पागलपन मगर अब जा नहीं सकता ॥
क्या करूँ मज्बूर हूँ अपनी तमन्ना से ?
फिर भी तो चाहूँ उसे जो पा नहीं सकता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, August 2, 2014

150 : ग़ज़ल - दोस्त कब सौ हज़ार.........


दोस्त कब सौ हज़ार करना है ?
इक दो बस ग़म गुसार करना है ॥
जिनसे नज़रें मिलाना हो मुश्किल ,
उनसे आँखों को चार करना है ॥
इस ज़माने में बस मोहब्बत के ,
और सब कुछ उधार करना है ॥
सब कहें प्यार और वो भी हम ,
अब तो हमको भी प्यार करना है ॥
ख़ुद को चाहे न हम सुधार सकें ,
दूसरों का सुधार करना है ॥
एक सुख की किनार पाने को ,
कितने दुक्खों को पार करना है ?
ज़िंदगी को चलाए रखने को ,
कोई तो रोज़गार करना है ॥
बाद मरने के भी रहें ज़िंदा ,
काम कुछ यादगार करना है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...