Thursday, May 9, 2013

मुक्तक : 200 - निहायत भौंडी सूरत


निहायत भौंडी सूरत वाला सुंदरलाल लिखता है ॥
हमेशा हारने वाला सिकंदरलाल लिखता है ॥
यहाँ की रीत है शैताँ फ़िरिश्ता ख़ुद को कहते हैं ,
भिखारी अपना असली नाम गब्बरलाल लिखता है ॥
(गब्बर =बहुमूल्य,घमंडी,धनी)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, May 8, 2013

मुक्तक : 199 - हादसा ऐसा ये


हादसा ऐसा ये मेरे साथ कैसे घट गया ?
जिसको सोचा था न सोचूँ मुझको वो ही रट गया !
जिससे चिढ़ थी दुश्मने जाँ दिल जिसे कहता रहा ,
उससे ही मैं आज जाकर छटपटाकर सट गया !
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


मुक्तक : 198 - बाल ना नोचता


बाल ना नोचता न सर को धुना करता था ॥
मेरी बकवास भी वो दिल से सुना करता था ॥
जब न मिलती थी तवज्जोह कहीं से मुझको ,
इक वही था जो मुझेआके गुना करता था ॥
(गुना=मानना, महत्व देना)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, May 7, 2013

88 : ग़ज़ल - मैं बेक़रार हूँ


मैं बेक़रार हूँ तुम , मुझको क़रार दे दो ।।
नफ़रत तो दी सभी ने , तुम प्यार-व्यार दे दो ।।1।।
इन्आम , तमगे मेरा , क्या पेट भर सकेंगे ?
गर हो सके तो मुझको , इक रोज़गार दे दो ।।2।।
चिल्लाते चीखते सब , स्वर मेरे फट गए हैं ,
मेरे गले को सिलने , वीणा के तार दे दो ।।3।।
बच्चे भी बातों बातों , में तानते तमंचे ,
मुझको क़लम बदल के , चाकू कटार दे दो ।।4।।
सूखे ये मिट्टी इससे , ऐ बुततराश पहले ,
इन बिगड़ी मूरतों को , सारे सुधार दे दो ।।5।।
पोशीदा ग़म मेरे सुन , सुनकर न लुत्फ़ ले जो ,
इक राज़दार ऐसा इक ग़मगुसार दे दो ।।6।।
कुछ लोग शौक़ से भी , लेते हैं क़र्ज़ तुमसे ,
मुझको ज़रूरतों की , ख़ातिर उधार दे दो ।।7।।
दीवारें मत दो मुझको , दरवाज़े , खिड़कियाँँ भी ,
बस मुझको तुम अकेली , छत उस्तुवार दे दो ।।8।।
(उस्तुवार=स्थायी/दृढ़ ,बुततराश=मूर्तिकार ,पोशीदा=गुप्त,ग़मगुसार=हमदर्द)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


 

Monday, May 6, 2013

मुक्तक : 197 - गिरते पाताल उच्च


गिरते पाताल उठा नील गगन हो जाते ॥
घोर तम भोर के सूरज की किरन हो जाते ॥
भूखे चीते जो लगे होते मनुज के पीछे ,
वृद्ध कच्छप युवा द्रुत गामी हिरन हो जाते ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, May 5, 2013

मुक्तक : 196 - जिससे कोई न


जिससे कोई न और साफ़ हो ज़माने में ॥
वक़्त उसी को लगे ज़ियादा ग़ुस्लख़ाने में ॥
जितना देखा गया ग़रीब ख़र्च में माहिर ,
उतना पाया गया अमीर धन बचाने में ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, May 4, 2013

मुक्तक : 195 - दिल में उनके


दिल में उनके सिवा न दूसरा शुमार रहा ॥
उनके क़ाबिल न थे उन्हीं से फिर भी प्यार रहा ॥
वो न आएँँगे ख़ूब जानते थे हम ये मगर ,
एक उनका ही मरते दम तक इंतज़ार रहा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...