Thursday, December 31, 2015

ग़ज़ल : 176 - कुत्तों को गोश्त ताज़ा



क्या ख़ूब अंधे-बहरे , दुनिया चला रहे हैं ?
हक़दार जो सज़ा के इन्आम पा रहे हैं ॥
जलती हुई ज़मीं पर , साया न अपना करते ,
बादल समंदरों पे , जा-जा के छा रहे हैं ॥
है पेश तश्तरी में , कुत्तों को गोश्त ताज़ा ,
मुफ़्लिस उठा के जूठन , घूड़े से खा रहे हैं ॥
ये किस तरह के पहरेदारों को रख रहे हो ,
जो चोर-डाकुओं को , अपना बता रहे हैं ?
दर पे लगा के ताला , चल देते हैं कहीं वो ,
गर जान जाएँ मेहमाँ , घर उनके आ रहे हैं ॥
बेखौफ़ धीरे-धीरे , कुछ दोस्त , दोस्त के ही ,
बैठक से सोने वाले , कमरे में जा रहे हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Wednesday, December 30, 2015

मुक्तक : 795 - थमती न थीं




थमतीं न थीं इक ठौर पे रहतीं थीं जो चंचल ॥
नदियों सी इठलाती चला करती थीं जो कलकल ॥
क्या हो गया गहरी भरी वो झील के जैसी ,
आँखे वो बनकर रह गईं क्यों थार का मरुथल ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Friday, December 25, 2015

मुक्तक : 794 - तेरा ही लालच है ॥



सफ़ेद झूठ नहीं है ये सच निरा सच है ॥
भरा हुआ तू हृदय में मेरे खचाखच है ॥
ये बुद्धि कहती है मुझको है तू असंभव ही ,
करूँ क्या ? मन को तेरा बस तेरा ही लालच है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, December 24, 2015

मुक्तक : 793 - पीने से रोक लेते ?



मर-मर के मुझको गर तुम जीने से रोक लेते ॥
सीना अड़ा के अपने सीने से रोक लेते ॥
क्यों होता बादाकश ? क्यों बेगाना होश से मैं ?
पहली ही काश ! बोतल पीने से रोक लेते ?
( बादाकश=शराबी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Wednesday, December 23, 2015

ग़ज़ल : 175 - सवार हम रहे ॥



उजड़े-उजड़े रहे कब बहार हम रहे ?
इसलिए हम न गुल सिर्फ़ ख़ार हम रहे ॥
तुम कुम्हार हो के भी ज़र के ज़ेवर रहे ,
बनके माटी के लौंदे सुनार हम रहे ॥
ख़ुद पे भी एतबार अब हमें सच नहीं ,
इतने धोख़ाधड़ी के शिकार हम रहे ॥
मक़्बरा भी हो तो क्या है तुम ताज हो ,
हो के मस्जिद भी उजड़ी मज़ार हम रहे ॥
तुम हवाई जहाजों पे उड़ते चले ,
रात-दिन बस गधों पे सवार हम रहे ॥
तुम रहे ख़ुशनसीबी से मंज़िल सदा ,
अपनी कमबख़्ती से रहगुज़ार हम रहे ॥
(गुल=पुष्प ,ख़ार=काँटा ,ज़र=स्वर्ण ,ज़ेवर=आभूषण ,एतबार=विश्वास ,कमबख़्ती=दुर्भाग्य )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, December 22, 2015

ग़ज़ल : 174 - आरक्त द्रव माहुर है तू ॥




मेरे प्रति निर्मम है अति निष्ठुर है तू ॥
शत्रुओं से प्रेम को आतुर है तू ॥
आदमी सा तू कभी चलता नहीं ,
साँप है या फिर कोई दादुर है तू ?
जब पड़े तू पंखुड़ी पर दे कुचल ,
ओस है या साँड़नी का खुर है तू ॥
चाहता कोई न क्यों सुनना तुझे ,
काक-वाणी है या खर का सुर है तू ?
मत स्वयं को माँग का सिंदूर कह ,
पाँव का आरक्त द्रव माहुर है तू ॥
हथकड़ी या पाँव की बेड़ी है रे ,
तू न मंगलसूत्र है नाँँ दुर है तू ॥
और सब बातों में तू कच्चा बड़ा ,
किन्तु अपने निर्णयों में धुर है तू ॥
( दादुर=मेंढक ,खुर=चौपायों के पाँव के निचले भाग का खोल या नाखून ,खर=गधा ,माहुर=आलता ,दुर=नाक या कान की मोती युक्त लटकन ,धुर=पक्का )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, December 20, 2015

ग़ज़ल : 173 - रंगीन नहीं होगा ॥



आकर्षण तुझ सम चुम्बक में भी न कहीं होगा ॥
तुझ सम्मुख सुंदरतम भी आसीन नहीं होगा ॥
आँखों को भाने वाले इतने तो हैं रँग तुझमें ,
इन्द्रधनुष तुझसे बढ़कर रंगीन नहीं होगा ॥
मीठेपन में तू मधु से मीठी ही तो निकलेगी ,
सागर भी तुझसे ज्यादा नमकीन नहीं होगा ॥
सीधी-सादी यौवन-गति सर्पों सी ही झूम उठे ,
तेरे सुर के आगे कोई बीन नहीं होगा ॥
तेरे दर्शन पा सुध-बुध भूल अपनी है कौन युवा ,
तेरी प्रीति में अष्ट-प्रहर लवलीन नहीं होगा ?
तेरा निर्धन स्वामी भी मैं धनपति ही समझूँ ,
तुझसे जो वंचित उससे कोई दीन नहीं होगा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...