Thursday, January 15, 2015

अकविता (10) - वक्तृता अथवा अंग्रेजी भाषा ?

क्या अंग्रेजों के ऊपर भी
एक अंग्रेजी की वक्तृता
मुझ जैसे
अंग्रेजी न जानने वाले हिन्दुस्तानी की तरह ही
कुछ भी न समझ आने के बावजूद भी
वशीभूत कर डालने वाला प्रभाव डालती है ?
इसी प्रकार की
अन्य किसी भाषा की वक्तृता भी
जिसकी भाषा भी मुझे नहीं आती
क्या अंग्रेजी की तरह ही प्रभाव डालती है ?
ठीक ऐसी ही वक्तृता
जो मेरी ही भाषा में हो
और जो मुझे समझ में भी आती हो
क्या अंग्रेजी की तरह ही मुझ पर प्रभाव डालती है ?
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि
महत्वपूर्ण क्या है ?
वक्तृता अथवा अंग्रेजी भाषा ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, January 14, 2015

अकविता (9)- यहाँ कोई विज्ञापन न लगाएँ









दीवारों पे जगह-जगह
चस्पा
इस बात का विज्ञापन
कि यहाँ
कोई विज्ञापन न लगाएँ
इस बात का स्पष्ट विज्ञापन लगता है
कि यहाँ
विज्ञापन करना
अवश्यमेव लाभदायक है
अतः
हमें मुँहमाँगा किराया देने की पेशकश करें ,
हमें मनाएँ
और यहाँ ही चिपकाएँ
अपने मनचाहे विज्ञापन ।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, January 13, 2015

अकविता (8) - कितना अच्छा था वह ?


उसके मरने के बाद -
कितना क़ीमती था वह ?
कितना उपयोगी था वह ?
कितना अच्छा था वह ?
और भी न जाने क्या-क्या वह था ?
जो उसे मैंने कभी नहीं समझा ,
कभी नहीं कहा -
पता चला ।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


अकविता : ( 7 ) - प्रशंसा


यद्यपि यह काम मुझे
अत्यंत चापलूसी पूर्ण लगता है
किन्तु जब कभी भी मैं
दृढ़ निश्चय करके
कुछ बोल ही देना ठान लेता हूँ
कि
शब्दों के
होंठ छोड़ने से ठीक पहले
बाँस हो जाती है उसकी दूब ,
दुग्धता हो जाती है डामर उसकी ,
लँगड़ा पड़ती है उसकी उड़ान ,
कंस हो जाता है उसका कृष्णत्व ।
मैं सच कहता हूँ
चाहे जिसकी शपथ उठवा लो
मैं प्रतिदिन
उसकी केवल प्रशंसा करना चाहता हूँ
तभी तो
अत्यंत कठिनाई से
रोक पाता हूँ अपने मुँह को
जो झड़ाने चला था पुष्प
अंगार उगलने से ।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, January 10, 2015

158: ग़ज़ल - मशहूर को जहाँँ से गुमनाम


मशहूर को जहाँँ से , गुमनाम बना डाला ।।
होते ही सुब्ह फ़ौरन , क्यों शाम बना डाला ।।1।।
मैकश हुआ ही तेरी , सुह्बत का असर पूरा ,
इक मै-अदू को भी मै-आशाम बना डाला ।।2।।
लतियाता तू न होता , तो बस मैं चना रहता ,
ठोकर ने तेरी काजू-बादाम बना डाला ।।3।।
पूनम की चाँदनी था , बरगद का था साया मैं ,
तूने भरी दुपहरी , का घाम बना डाला ।।4।।
हालात ने वो करवट बदली कि सियावर को ,
श्रीराम से बदल राधेश्याम बना डाला ।।5।।
( मैकश=शराबी ,मै-अदू=मदिरा-शत्रु ,मै-आशाम=मदिरा-प्रेमी ,घाम=धूप )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, January 9, 2015

मुक्तक : 659 - मिर्ची की चटनी गालों के


मिर्ची की चटनी गालों के छालों पे मत घिस ।।
काजल उबटन जैसा गोरे गालों पे मत घिस ।।
तेल बदाम का , नरियल का , जैतून का छोड़ अरे ,
केरोसिन-डीज़ल घुँघराले बालों पे मत घिस ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, January 8, 2015

मुक्तक : 658 - तोहफ़े वो भेजें


तोहफ़े वो भेजें जानबूझकर न भूल के ।।
काँटों के वो भी नोकदार चुन बबूल के ।।
उस पर भी तुर्रा कहके ये कुबूलें हम उन्हें ,
जैसे वो फाहे रूई के हों , गुच्छे फूल के ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...