Friday, March 9, 2018

ग़ज़ल : 251 - खोए-खोए ही रहते हैं


मेरी तक्लीफ़ का उनको अंदाज़ क्या ?
हँसने का भी उन्हें है पता राज़ क्या ?
आजकल खोए-खोए ही रहते हैं तो '
कर चुके वो मोहब्बत का आग़ाज़ क्या ?
जो बुलाते हैं दुत्कार के फिर मुझे ,
उनकी दहलीज़ मैं जाऊँगा बाज़ क्या ?
ऐसी चलती है उनकी ज़ुबाँ दोस्तों ,
उसके आगे चलेगी कोई गाज़ क्या ?
पेट भी जो हमारा न भर पाए गर ,
उस हुनर पर करें भी तो हम नाज़ क्या ?
तोहफ़े में मुझे तुम न संदूक दो ,
मुझसा ख़ाली रखेगा वहाँ साज़ क्या ?
( बाज़ = पुनः / गाज़ = कैंची )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, March 2, 2018

ग़ज़ल : 250 - कुत्ते सी हरक़त



आपस में बेमक़सद लड़ते मरते देखा है !!
इंसाँ को कुत्ते सी हरक़त करते देखा है !!
गिरगिट से भी ज्यादा रंग बदलने वाले को ,
मैंने होली में रंगों से डरते देखा है !!
गर तुमने देखी है चूहे से डरती बिल्ली ,
मैंने भी बिल्ली से कुत्ता डरते देखा है !!
प्यार में अंधे कितने ही फूलों को हँस-हँसकर ,
नोक पे काँटों की होठों को धरते देखा है !!
हैराँ हूँ कल मैंने इक ज्वालामुखी के मुँह से ,
लावे की जा ठण्डा झरना झरते देखा है !!
कैसा दौर है कल इक भूखे शेर को जंगल में ,
गोश्त न मिलने पर सच घास को चरते देखा है !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, February 26, 2018

मुक्त मुक्तक : 879 - अच्छी नहीं ज़रा भी.....



अच्छी नहीं ज़रा भी , है इस क़दर ख़राब !!
कहते हैं लोग मेरी है ज़िंदगी अज़ाब !!
दिन-रात इतनी मैंने पी है कि अब तो आह !
मेरी रगों में बहती ख़ूँ की जगह शराब !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, February 25, 2018

मुक्त मुक्तक : 878 - यह को वह .......


तजकर कभी , कभी सब कुछ गह लिखा गया !!
पीकर कभी , कभी प्यासा रह लिखा गया !!
लिखने का जादू सर चढ़ बोला तो बोले सब ,
ये क्या कि मुझसे ' यह ' को भी ' वह ' लिखा गया !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 877 - गूँगी तनहाई.......


गूँगी तनहाई में चुपचाप जब मैं रहता हूँ !!
रौ में जज़्बातों की तिनके से तेज़ बहता हूँ !!
लिखने लगता हूँ मैं तब शोक-गीत रोते हुए ,
या कोई शोख़ ग़ज़ल गुनगुना के कहता हूँ !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, February 19, 2018

चित्र काव्य : वो


बहुत ही ख़ास बहुत ही अज़ीज़ था मेरा , वो उस जगह पे कहीं हाय खो गया इक दिन ॥ 
चुरा के मुझ से मेरा दिल क़रार की नींदें , बग़ैर मुझ को बताये ही सो गया इक दिन ॥ 
-डॉ॰ हीरालाल प्रजापति 

Sunday, February 18, 2018

चित्र काव्य - खम्भा



यों ही कमर पे हाथ न रखकर खड़ा हूँ मैं !!
खंभे सा उसके इंतज़ार में गड़ा हूँ मैं !!
बैठे हैं वो न आने की क़सम वहाँ पे खा ,
उनको यहाँ बुलाने की ज़िद पर अड़ा हूँ मैं !! 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...