Wednesday, May 18, 2016

गीत : 45 - सद्प्रीत

तुझको मैं आजन्म अपना मीत लिक्खूंगा ॥
तुझको मुझमें रुचि नहीं है जानता हूँ मैं ।
योग्य भी तेरे न मैं ये मानता हूँ मैं ।
तू करे दिन रात मुझसे धुर घृणा तो भी ,            
मैं तुझे पल-पल मेरी सद्प्रीत लिक्खूंगा ॥
व्यर्थ दुःख-पीड़ा निरंतर हर तरह केवल ।
तूने यद्यपि मुझको सौंपा है विरह केवल ।
फिर भी तुझको लेके रति-संयोग श्रंगारिक ,
मैं तो हर्ष-उन्माद पूरित गीत लिक्खूंगा ॥
प्रेम-स्वप्निल माल अधटूटी पड़ी मेरी ।
तुझको पाने की शपथ झूठी पड़ी मेरी ।
पाते-पाते तुझको पा पाया न मैं तो क्या ?
होके मेरी हार तुझको जीत लिक्खूंगा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, May 17, 2016

मुक्तक : 837 - भूखा भेड़िया




गाय को भूखा भेड़िया या शेर होने पे ॥
आबे ज़मज़म में हलाहिल खुला डुबोने पे ॥
आह को लेके क्या मेरी तबाह होना है ?
रूह आमादा मेरी मत करो या ! रोने पे ॥
( आबे ज़मज़म = अमृत जल , हलाहिल = कालकूट विष , रूह = आत्मा , आमादा = उद्धत , तत्पर )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 836 - पानी पर से हाथी



जैसे पानी पर से हाथी चल निकल आया ॥
काले पत्थर में से मीठा जल निकल आया ॥
रात-दिन मैं ढूँढता था जिसको मर-मर कर ,
मेरी मुश्किल का कुछ ऐसे हल निकल आया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, May 15, 2016

मुक्तक : 835 - जीवन



खट्टे-मीठे के सँग तीखापन-कड़वाहट भी होती ॥
चुप-चुप सन्नाटों के सँग में फुस-फुस आहट भी होती ॥
जीवन में क्या-क्या है शामिल ; गिनवाना बालों जैसा ?
बेफ़िक्री भी इसमें कुछ-कुछ , कुछ घबराहट भी होती ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : 44 - जी भर गया है ॥



कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ?
मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥
न धोखाधड़ी की न जुल्म-ओ-जफ़ा की ।
जो करता हो बातें हमेशा वफ़ा की ।
मगर तज़्रिबा अपना ज़ाती ये कहता ,
वही हमसे अक़्सर ही करता दग़ा है ॥
कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ?
मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥
वो ग़ैरों को क्या अपनों तक को भी खलती ।
मैं करता हूँ जब देखो तब बात जलती ।
उगलती ज़ुबाँ बर्फ़ भी आग जैसा ,
क़सम से मेरा इस क़दर दिल जला है ॥
कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ?
मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥
हुई साथ में जिसके ख़ालिस बुराई ।
ज़माने ने बस जिसको ठोकर लगाई ।
कई मर्तबा जो गिराया गया हो ,
वही आस्माँ से भी ऊँचा उठा है ॥
कि चाहो तो क्या तुम न चाहो तो क्या है ?
मोहब्बत से अब अपना जी भर गया है ॥
( तज़्रिबा = अनुभव , ज़ाती = निजी , ख़ालिस = विशुद्ध )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, May 13, 2016

मुक्तक : 834 - तुममें स्वर विध्वंस के ॥



कृष्ण के सब मूक हो वाचाल होते कंस के ॥
उठ रहे हैं धीरे-धीरे तुममें स्वर विध्वंस के ॥
हो गया ऐसा तुम्हारे साथ में क्या दुर्घटित ,
रँग रहे हो काग रँग सब छोड़कर ढंग हंस के ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, May 12, 2016

मुक्तक : 833 - नर्म बाँहों में.......



हाथ में झट हाथ मेरा धर लिया उसने ॥
नर्म बाँहों में फटाफट भर लिया उसने ॥
इश्क़ के इज़हार का ढंग सोचता ही था ,
आ के इक़रारे मोहब्बत कर लिया उसने ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...