Monday, February 9, 2015

159 : ग़ज़ल - ना बने तो मत बना.......


ना बने तो मत बना पर और मत बिगाड़ तू ॥
मत फटे में और टाँग को अड़ा के फाड़ तू ॥
आड़ वाले काम आड़ यदि न मिल सके न कर ,
कुछ भी हो कभी न करना खोलकर किवाड़ तू ॥
बेचकर के घोड़े सो रही हैं भेड़-बकरियाँ ,
और थोड़ी देर मूक रह न सिंह दहाड़ तू ॥
मैंने मरुथलों में फ़सलें रस भरी उगाईं हैं ,
प्यास तू बुझाले चूस किन्तु मत उजाड़ तू ॥
अपनी भूल पे मैं लाज से गड़ा हूँ पहले ही ,
कर कृपा भरी सभा में मत पुनः लताड़ तू ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, February 7, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 670 - झूठे राजा हरिश्चन्द्र


लुंज केंचुए मेनकाओं को नृत्य सिखाते हैं ॥
झूठे राजा हरिश्चन्द्र को सत्य सिखाते हैं ॥
सूरदास इस नगर के वितरित करते-फिरते दृग ,
सदगृहस्थ को अविवाहित दांपत्य सिखाते हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, February 6, 2015

मुक्तक : 669 - मुझमें क्या ख़ास है


मुझपे क़ुर्बान है सौ-सौ दफ़ा फ़िदाई है ॥
मुझ सरिस काग से हंसी को आश्नाई है ॥
मुझमें क्या ख़ास है मुझको नहीं पता लेकिन ,
सच है क़िस्मत तो करिश्माई मैंने पाई है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, February 5, 2015

मुक्तक : 668 - व्यक्ति अब लगभग मशीनीकृत


भावना की दृष्टि से अध-मृत हुए हैं ॥
व्यक्ति अब लगभग मशीनीकृत हुए हैं ॥
जन्म के कुछ एक नाते छोड़ सचमुच ,
स्वार्थ पर संबंध सब आधृत हुए हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, February 4, 2015

मुक्तक : 667 - पैर तुड़वाकर भी बस चलते रहे


पैर तुड़वाकर भी बस चलते रहे रे ॥
तेल-बाती ख़त्म कर जलते रहे रे ॥
तेरी मर्ज़ी ,आग तेरी ,तेरे साँचे ,
लोह से हम मोम बन ढलते रहे रे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, February 3, 2015

गीत (21) - मुझको मेरा लखनऊ दिल्ली


भूल विदूषक की भी हँसकर ,
मित्र उड़ाओ मत तुम खिल्ली ॥
सोची-समझी , देखी-परखी ।
मैंने तब जाकर है रक्खी ।
काली ,काली नागिन जैसी –
चूहे की रक्षा को बिल्ली ॥
तेरा तुझको श्याम श्वेत है ।
मेरा गमला मुझे खेत है ।
तुझको तेरी चींटी बिच्छू –
मुझको साँप है मेरी इल्ली ॥
माना तेरा नगर नियारा ।
मुझको मेरा गाँव पियारा ।
तेरी दिल्ली तो दिल्ली है –
मुझको मेरा लखनऊ दिल्ली ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, February 1, 2015

गीत (20) - ठेस यदि मन को लगी.....


सत्य कहता हूँ उठाकर प्राणप्रिय की मैं शपथ –
ठेस यदि मन को लगी मेरी मरन हो जाएगी ॥
पीट लो जी चाहे जितना चर्म-कोड़ों से ।
फोड़ दो सर मोटे डंडों से या रोड़ो से ।
ऊँचे-ऊँचे पर्वतों से मुझको फिंकवा दो ,
रौंदवा दो बैलगाड़ी अथवा घोड़ों से ।
मेरे तन की वज्रता की देखलो करके परख –
मुझको कायागत हर इक पीड़ा सहन हो जाएगी ॥
तुझको हँसता देख होता हूँ सुखी मन में ।
तुझको रोता पाऊँ तो होता दुखी मन में ।
मैं हँसा करता सदा तुझको हँसाने को ,
कस-दबाकर कष्ट के ज्वालामुखी मन में ।
मुझको ठुकरा दे न होगा कोई पछतावा न दुख –
और को अपनाएगी तो फिर जलन हो जाएगी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...