Friday, November 23, 2018

कविता : नास्तिकता क्यों ?


धर्मभीरु भर घृणा से करते हैं आपस में बत ।
धर्म से च्युत ईश्वर से सर्वथा हूँँ मैं विरत ।। 
पूछते रहते हैं मैं क्यों नास्तिक हूँँ तो सुनो ।
पूर्णत: ध्यानस्थ होकर तथ्यत: सर्वस गुनो ।। 
किंतु यह भी जान लो मैं यह कभी कहता नहीं ।
वह जिसे भगवान कहते सब जगह रहता नहीं ।।
पूर्णत: आश्वस्त हो निज सत्य को मैं धर रहा ।
सर्वथा है व्यक्तिगत अभिव्यक्त जो मैं कर रहा ।।
यह मेरी और उस ख़ुदा की शत्रुता का रूप है ।
जिसने मरुथल में मुझे जो धूप पर दी धूप है ।।
लोग कहते हैं कि उसके हाथ में हर बात है ।
वह जो चाहे सब छुड़ाले या वरे सौग़ात है ।।
वह असंभव को भी संभव चुटकियों में कर धरे ।
वह निपूतों की भी गोदी बाल बच्चों से भरे ।।
सच कहूँँ गुड़िया से भी प्यारी महज औलाद इक ।
हमने भी पाई थी कितनी मन्नतों के बाद इक ।।
यूँँ लगा जैसे मरुस्थल में हुई गंगा प्रकट ।
मिल गई अंधों को आँँखें भिक्षुओं को स्वर्णघट ।।
शुक्रिया रब का कभी करना ना हम भूले मगर ।
हो गया इक दिन ख़फ़ा जाने न वो किस बात पर ।।
सच कहूँँ सच्चाई से भी अत्यधिक सच्ची मेरी ।
अल्पवय में ही अचानक पुष्प सी बच्ची मेरी ।।
खेलते ही खेलते इक दिन अचानक यों गिरी ।
लाइलाज ऐसे भयानक रोग से वह जा घिरी ।।
विश्व में औषध नहीं ऐसे किसी बीमार की ।
डॉक्टर बोले ये बस पाहुन है दिन दो-चार की ।।
अस्पताल उसको लिए गोदी में हम फिरते रहे ।
बेचकर सब कुछ इलाज उसका मगर करते रहे ।।
रात-दिन करते रहे विश्वास रख रब से दुआ ।
पर चमत्कार ईश्वर की ओर से जब ना हुआ ।।
यूँँ लगे सीने में खंजर-तीर से धँसते हुए ।
उठ गई जिस दिन वो बेहोशी में भी हँसते हुए ।।
यों बिलख कर रोए हम पत्थर भी पानी हो गया ।
तब से नज़रों में हमारी रब भी फ़ानी हो गया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
( एक मित्र के सतत अनुरोध पर यह कविता लिखी जिनकी प्राणप्रिय इकलौती पुत्री अल्पावस्था में ब्रेन ट्यूमर से इस जहाँ में नहीं रही )

Sunday, October 21, 2018

ग़ज़ल : 269 - आसव


   शुद्ध गंगाजल से आसव हो गया हूँ ।।
   शिव था बिन तेरे पुरा-शव हो गया हूँ ।।
   बुलबुलों से कोयलों से भी मधुर मैं ,
   तुम नहीं तो मूक-नीरव हो गया हूँ ।।
   जानता हूँ  तुम नहीं होओगे मेरे ,
   क्या करूँ हृद-आत्म से तव हो गया हूँ ?
   तुम रहे जैसे थे वैसे ही तो मैं भी ,
   कौन सा प्राचीन से नव हो गया हूँ ?
   शक्य शेरों को भी मैं पहले नहीं था ,
   अब श्रृगालों को भी संभव हो गया हूँ !! 
   जैसे बिन राधा हुए थे कृष्ण , तुम बिन 
   मैं भी त्यों सियहीन राघव हो गया हूँ ।।
   ( आसव = शराब , पुरा-शव = पुरानी लाश , मूक = चुप , नीरव = बिना शब्द का , तव = तुम्हारा , शक्य = संभव , श्रृगाल = गीदड़ ,       राघव = श्रीराम )
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, September 23, 2018

मुक्त मुक्तक : 888 - भगवान बिक रहा है


   क्या क्या न इस जहाँ में सामान बिक रहा है ?
   बकरा कहीं ; कहीं पर इंसान बिक रहा है ।।
   हैरान हूँ कि सब कुछ महँगा यहाँ है लेकिन ,
   सस्ता दुकाँ दुकाँ में भगवान बिक रहा है ।। 
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, September 22, 2018

ग़ज़ल : 268 - मेहँदियाँ


    मुझसे तुम दो ही पल भर सटी रह गयीं ।। 
    सारी दुनिया की आँखें फटी रह गयीं ।। 
    मैं गुटक कर ख़ुशी कद्दू होता गया , 
    तुम चबा फ़िक्र को बरबटी रह गयीं ।। 
    चाहकर बन सका मैं न सर्कस का नट ,
    तुम नहीं चाह कर भी नटी रह गयीं ।। 
    और सब कुछ गया भूल मैं अटपटी ,
    चंद बातें तुम्हारी रटी रह गयीं ।।
    कोई जीता न हारा मगर जंग में ,
    फ़ौजें बेचारी बस सरकटी रह गयीं ।।
    तेरे हाथों में लगने की ज़िद पर अड़ी , 
    मेहँंदियाँ कितनी ही बस बटी रह गयीं ।।
              -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, September 21, 2018

मुक्त मुक्तक : 887 - धृतराष्ट्र



  बैठे-ठाले मन रंजन को 
  अपना धंधा बोल न तू ।।
  बोगनविलिया के फूलों को 
  रजनीगंधा बोल न तू ।।
  जिनके मन के दृग हों फूटे ,
  उनको कह धृतराष्ट्र बुला ,
  किंतु कभी बस चर्म के चक्षु-
  विहीन को अंधा बोल न तू ।।
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, September 16, 2018

गीत : 50 - हाथ काँधों पर नहीं


हाथ काँँधों पर नहीं गर्दन से सर ग़ायब ,
पैर भी टूटे हुए हैं फिर भी ज़िंदा हूँँ !!
पीठ पर मेरे न इक पर लेकिन आँँखों में ,
ख़्वाब उड़ानों के लिए जीता परिंदा हूँँ !!
हाथ में लेकर चिरागों क्या मशालों को ,
ढूँँढने पर भी न पाओगे कहीं मुझसा ।।
मैं बुरा हूँँ या भला हूँँ इस ज़माने में ,
दूसरा हरगिज़ यहाँँ कोई नहीं मुझसा ।।
क्यों हूँँ मैं ? जानूँँ न मैं इतना मगर तय है ,
मैं अजब हूँँ ,मैं ग़ज़ब हूं ,मैं चुनिंदा हूँँ ।। 
हाथ काँँधों पर नहीं गर्दन से सर ग़ायब ,
पैर भी टूटे हुए हैं फिर भी ज़िंदा हूँँ !!
पीठ पर मेरे न इक पर लेकिन आँँखों में ,
ख़्वाब उड़ानों के लिए जीता परिंदा हूँँ !!
वो ज़माना क्या हुआ जब मुझ से जुड़कर तुम ,
चाहते थे शह्र में मशहूर हो जाऊँँ ? 
कर रहे हो रात दिन ऐसे जतन अब क्यों ,
मैं तुम्हारी ज़िंदगी से दूर हो जाऊँँ ?
मत रगड़ , धो-धो मिटाने की करो कोशिश ,
दाग़ माथे का नहीं मैं एक बिंदा हूँँ ।।
हाथ काँँधों पर नहीं गर्दन से सर ग़ायब ,
पैर भी टूटे हुए हैं फिर भी ज़िंदा हूँँ !!
पीठ पर मेरे न इक पर लेकिन आँँखों में ,
ख़्वाब उड़ानों के लिए जीता परिंदा हूँँ !!
( पर = पंख ; बिंदा = माथे पर लगाने वाली बड़ी गोल बिंदी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, September 2, 2018

ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक




तोप से बंदूक से इक तीर हो बैठा ।।
नौजवानी में ही साठा पीर हो बैठा ।।
चुप रहा तो बज गया दुनिया में गूँँगा वो ,
कह उठा तो सीधे ग़ालिब-मीर हो बैठा ।।
बनके इक सय्याद रहता था वो जंगल में ,
आके दर्याओं में माहीगीर हो बैठा ।।
हिज़्र में दिन-रात सोते-जागते फिरते ,
रटते-रटते हीर...राँँझा हीर हो बैठा ।।
जो कहा करता था इश्क़ आज़ाद करता है ,
उसके ही पाँँवों की वह ज़ंजीर हो बैठा ।।
इस क़दर उसको सताया था ज़माने ने ,
वह छड़ी से लट्ठ फिर शमशीर हो बैठा ।।
उसने मर्यादा को अपनाया तो सच मानो ,
वह निरा रावण...खरा रघुवीर हो बैठा ।।
( साठा=साठ वर्ष का ,पीर=वृद्ध , सय्याद=चिड़ीमार ,
दर्या=नदी ,माहीगीर=मछली पकड़ने वाला ,हिज़्र=विरह ,
शमशीर=तलवार ,रघुवीर=रामचंद्र )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...