Wednesday, January 15, 2020

गीत : 54 - शिकस्ता दिल


यक़ीनन है शिकस्ता दिल जवाँ होकर भी वो वर्ना ।।
न कहता नौजवानों से मोहब्बत-इश्क़ से बचना ।।1।।
ख़ुुदा ने जब तुम्हें बख़्शी है सूरत चाँद से प्यारी ;
तुम्हारा जिस्म जैसे राजधानी की है फुलवारी ;
तुम्हें सिंगार से ज्यादा है फबती सादगी फिर क्या -
मुनासिब है यूँ ही सजने में ज़ाया वक़्त को करना ?2?
यक़ीनन है शिकस्ता दिल जवाँ होकर भी वो वर्ना ,
न कहता नौजवानों से मोहब्बत-इश्क़ से बचना ।।
अगर तेरा मोहब्बत में जो पड़ने का इरादा है ;
तो सुन ले सब शराबों से कहीं इसमें ज़ियादा है ;
अगर चढ़ जाए तो फिर ये किसी सूरत नहीं उतरे ,
वो कहता है नशा-ए-इश्क़ बिलकुल भी नहीं चखना ।।3।।
यक़ीनन है शिकस्ता दिल जवाँ होकर भी वो वर्ना ,
न कहता नौजवानों से मोहब्बत-इश्क़ से बचना ।।
मोहब्बत लाज़िमी इस उम्र में सबको कहानी में ;
लगे है इश्क़ ही जैसे हो सब कुछ नौजवानी में ;
मगर कहता है जो तो क्या ग़लत कहता है वो बोलो ?
"कभी मत कमसिनी में आशिक़ी के फेर में पड़ना ।।"4।।
यक़ीनन है शिकस्ता दिल जवाँ होकर भी वो वर्ना ,
न कहता नौजवानों से मोहब्बत-इश्क़ से बचना ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, January 14, 2020

मुक्तक : 948 - अदम आबाद


मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।।
हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।।
उनसे वादा था हमारा साथ मरने का ,
कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, January 13, 2020

मुक्तक : 947 - फ़र्ज़


अपने चुन-चुन दर्दो-ग़म दिल में दबाकर रख रहा ।।
हँसते-हँसते वह , न बिलकुल मुँह बनाकर रख रहा ।।
फ़र्ज़ , ज़िम्मेदारियों का वज़्न पर्वत से न कम ;
अपने पूरे घर की , फूलों सा उठाकर रख रहा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, January 11, 2020

मुक्तक : 946 - फूल


जो रखते हैं यहाँ पे चंद उसूल मुझ जैसे ;
नहीं सभी को होते हैं क़बूल मुझ जैसे ।।
गुलाब , मोगरे , कँवल की दुनिया दीवानी ;
करे है सख़्त नापसंद फूल मुझ जैसे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, January 6, 2020

दीर्घ मुक्तक - 945 - माज़ी ( अतीत )


कौन सा ज़ह्र खा हमने जाँ छोड़ दी , 
बिन तुम्हारे भी जीने को जीते रहे ।।
ये अलग बात है साथ तुम थे तो सच , 
मुश्क़िलों से ज़ियादा सुभीते रहे ।।
गर्मियों की चिलकती हुई धूप में , 
हम दरख़्तों के साए में जा बैठकर ; 
प्यास अपनी बुझाने को माज़ी में जा , 
तेरी यादों के शर्बत को पीते रहे ।। 
-डॉ हीरालाल प्रजापति

Thursday, January 2, 2020

दीर्घ मुक्तक : 944 - दीदार


बाद जाने के तेरे तुझको पता क्या फिर से तेरे ,
लौटकर आने का रस्ता रात-दिन तकते रहेंगे ।।
और कुछ हरगिज़ न बोलेंगे कभी अपनी जुबाँ से ,
सिर्फ़ तेरा नाम ही ईमान से रटते रहेंगे ।।
सख़्त तनहाई हो या महफ़िल हो इससे बेअसर रह ,
हम तेरे दीदार के प्यासे किसी मानिंदे बुत ही ,
इक दफ़ा भी इक पलक झपके बिना तेरी क़सम रे ,
सिर झुका कर बस तेरी तस्वीर ही लखते रहेंगे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Wednesday, January 1, 2020

गीत : 53 - साल नया सबको मुबारक़


हो साल नया सब को मुबारक़ न कहूँगा !!
इस बार में नववर्ष का स्वागत न करूँगा ।।
रंजीदा हूँ , ग़मगीन हूँ , मातम से भरा हूँ ,
बाहर से लगूँ ज़िंदा पर अंदर से मरा हूँ ,
महफ़िल को लगाने दो ठहाकों पे ठहाके ,
मैं तो मज़ाक़ो-मस्ख़री पे भी न हँसूँगा ।।
हो साल नया सब को मुबारक़ न कहूँगा !!
इस सन में यूँ तक़्लीफ़ उठाई है सुनो तो ,
बारिश में पतँग जैसे उड़ाई है सुनो तो ,
उम्मीद की अब भी न किरन सामने मेरे ,
बेरहम मुश्क़िलों से मैं कब तक के लडूँगा ।।
हो साल नया सब को मुबारक़ न कहूँगा !!
सूरत में किसी भी वो किसी हाल में तय थी ,
जिस ख़्वाब की ताबीर इसी साल में तय थी ,
ख़त्म उसकी मियाद हो गई जब कुछ न बचा रे ,
अरमाँ मैं भला क्या कोई अब पाल सकूँगा ?
हो साल नया सब को मुबारक़ न कहूँगा !!
इस बार में नववर्ष का स्वागत न करूँगा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...