मुझको लगता है ये ज़ह्र खा , ख़ुदकुशी कर ना जाऊँ कहीं ?
अगले दिन की करूँ बात क्या , आज ही कर ना जाऊँ कहीं ?
है तो दुश्मन मेरा वो मगर , ख़ूबसूरत हसीं इस क़दर ;
देखकर मुझको होता है डर , आशिक़ी कर ना जाऊँ कहीं ?
एक वाइज हूँ मैं पर मेरी , इक शराबी से है दोस्ती ;
मुझ को शक़ हो मैं भूले कभी , मैक़शी कर ना जाऊँ कहीं ?
मस्ख़री की लतीफ़ेे कहे , देख सुन भी वो चुप ही रहे ;
देखने उसका हँसना उसे , गुदगुदी कर ना जाऊँ कहीं ?
आज हालात हैं पेश वो , उम्र भर हाय जिस काम को ;
सख़्त करने से बचता रहा , मैं वही कर ना जाऊँ कहीं ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति






