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Sunday, January 28, 2018
Friday, January 5, 2018
Monday, January 1, 2018
शुभकामना नववर्ष की.........
बादलों से गिर धरा पर कड़कड़ाती बिजलियों को ।।
जल से बाहर तड़फड़ाती फड़फड़ाती मछलियों को ।।
फूल पर मंडराते भँवरों स्वस्थ-सुंदर तितलियों को ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
तंग गलियां सूनी सड़कों घर-मकानों के लिए ।।
मंदिरों की आरती कोठों के गानों के लिए ।।
सब पुलिसवालों को , सेना के जवानों के लिए ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
पापियों का सर जो काटें उन छुरी-तलवारों को ।।
शत्रु के पग में चुभें उन कीलों को उन ख़ारों को ।।
वक्त पर जो काम आये उन बुरे-बेकारों को ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
जल से बाहर तड़फड़ाती फड़फड़ाती मछलियों को ।।
फूल पर मंडराते भँवरों स्वस्थ-सुंदर तितलियों को ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
तंग गलियां सूनी सड़कों घर-मकानों के लिए ।।
मंदिरों की आरती कोठों के गानों के लिए ।।
सब पुलिसवालों को , सेना के जवानों के लिए ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
पापियों का सर जो काटें उन छुरी-तलवारों को ।।
शत्रु के पग में चुभें उन कीलों को उन ख़ारों को ।।
वक्त पर जो काम आये उन बुरे-बेकारों को ।।
यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
Saturday, December 2, 2017
ग़ज़ल : 247 - परदेस में
देस से परदेस में आकर हुआ मैं ।।
सेर भर से एक तोला भर हुआ मैं ।।1।।
रेलगाड़ी जब से पाँवों से है गुज़री ,
सच में उस दिन से ही यायावर हुआ मैं ।।2।।
कब रहा काँटा मैं ग़ुस्से में भी कल तक ,
प्यार में भी आजकल ख़ंजर हुआ मैं ।।3।।
हो गया था आदमी जानूँ न कैसे ,
फिर वही पहले सा इक बंदर हुआ मैं ।।4।।
एक वो रहने लगे क्या दिल में मेरे ,
कमरे से होटल के यारों घर हुआ मैं ।।5।।
देखकर बर्ताव दुनिया का गुलों सँग ,
मोम से इक सख़्ततर पत्थर हुआ मैं ।।6।।
( यायावर = घुमक्कड़ , nomad )
( यायावर = घुमक्कड़ , nomad )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
Sunday, November 26, 2017
ग़ज़ल : 246 - क़ब्र खोदने को ......
हैराँ हूँ ; लँगड़े , चीतों सी तेज़
चाल लेकर ।।
चलते हैं रोशनी में अंधे मशाल
लेकर ।।1।।
हुशयारों से न जाने करते हैं
कैसे अहमक़ ,
आज़ादियों के चर्चे हाथों में
जाल लेकर ।।2।।
चलते नहीं उधर से तलवार , तीर कुछ भी ,
जाते हैं फिर भी वाँ सब हैराँ हूँ ढाल लेकर ।।3।।
हरगिज़ कुआँ न खोदें प्यासों
के वास्ते वो ,
बस क़ब्र खोदने को चलते कुदाल
लेकर ।।4।।
माथे नहीं हैं जिनके उनके लिए
तिलक को ,
कुछ लोग थालियों में घूमें
गुलाल लेकर ।।5।।
कुछ माँगने चला हूँ तो ये मुफ़ीद होगा ,
जाऊँ मैं उनके आगे मँगतों सा
हाल लेकर ।।6।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
Tuesday, November 14, 2017
ग़ज़ल : 245 - धूप क्या होती है
एक पतला जानकर पापड़ तला वो ।।
बिन हथौड़ा तोड़ने मुझको चला
वो ।।1।।
धूप क्या होती है दुख की , क्यों वो जाने ?
सुख के साये में हमेशा ही पला
वो ।।2।।
फूँककर पीता है गर जो छाछ को
भी ,
दूध का होगा यक़ीनन इक जला वो ।।3।।
है नहीं मँगता मगर जब जब भी
आया ,
दर से मेरे कुछ लिये बिन कब
टला वो ।।4।।
जो मुकर जाता है अपनी बात से
फिर ,
आदमी तो है मगर इक दोग़ला वो ।।5।।
आज के हालात ने ही उसको बदला
,
कल तलक इंसान था सच , इक भला
वो ।।6।।
राधिका
उसको मिली कैसे हूँ हैराँ ?
जबकि रत्ती भर नहीं है साँवला
वो ।।7।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
Monday, November 13, 2017
ग़ज़ल : 244 - मामूली मकान
पहले दिखती थी तुलसी , आज पान लगती है ।।
पल में गीता तो दम में , वो क़ुरान लगती है ।।
पूछ मत कि कैसी है , उसकी सौत में लज़्ज़त ,
उसके मुँह से तो गाली , भी अजान लगती है ।।
एक हम जो बचपन में , भी हैं दिखते अधबूढ़े ,
वो पचास की भी सच , नौजवान लगती है ।।
वो निगाहों से अपनी , क़त्ल करती है सबका ,
सख़्त हैराँ हूँ सबको , अपनी जान लगती है ।।
शर्तिया महल है वो , जाने तुमको बाहर से ,
क्यों वो एक मामूली , सा मकान लगती है ।।
बेमिसाल ओ लासानी , वो बहुत जुदा सबसे ,
वो न इस सरीखी ना , उस समान लगती है ।।
जिसको देखो उसको ही , चुप कराता फिरता पर ,
मुझको बोलती भी वो , बेज़ुबान लगती है ।।
( सौत =आवाज़ , लज़्ज़त =आनंद ,लासानी =अद्वितीय )
मुझको बोलती भी वो , बेज़ुबान लगती है ।।
( सौत =आवाज़ , लज़्ज़त =आनंद ,लासानी =अद्वितीय )
-डॉ. हीरालाल
प्रजापति
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