Tuesday, November 14, 2017

ग़ज़ल : 245 - धूप क्या होती है

                                         

एक पतला जानकर पापड़ तला वो ।।
बिन हथौड़ा तोड़ने मुझको चला वो ।।1।।
धूप क्या होती है दुख की , क्यों वो जाने ?
सुख के साये में हमेशा ही पला वो ।।2।।
फूँककर पीता है गर जो छाछ को भी ,
दूध का होगा यक़ीनन इक जला वो ।।3।।
है नहीं मँगता मगर जब जब भी आया ,
दर से मेरे कुछ लिये बिन कब टला वो ।।4।।
जो मुकर जाता है अपनी बात से फिर ,
आदमी तो है मगर इक दोग़ला वो ।।5।।
आज के हालात ने ही उसको बदला ,
कल तलक इंसान था सच , इक भला वो ।।6।।
राधिका उसको मिली कैसे हूँ हैराँ ?
जबकि रत्ती भर नहीं है साँवला वो ।।7।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, November 13, 2017

ग़ज़ल : 244 - मामूली मकान



पहले दिखती थी तुलसी , आज पान लगती है ।।
पल में गीता तो दम में , वो क़ुरान लगती है ।।
पूछ मत कि कैसी है , उसकी सौत में लज़्ज़त ,
उसके मुँह से तो गाली , भी अजान लगती है ।।
एक हम जो बचपन में , भी हैं दिखते अधबूढ़े ,
वो पचास की भी सच , नौजवान लगती है ।। 
वो निगाहों से अपनी , क़त्ल करती है सबका ,
सख़्त हैराँ हूँ सबको , अपनी जान लगती है ।।
शर्तिया महल है वो , जाने तुमको बाहर से ,
क्यों वो एक मामूली , सा मकान लगती है ।।
बेमिसाल ओ लासानी , वो बहुत जुदा सबसे ,
वो न इस सरीखी ना , उस समान लगती है ।।
जिसको देखो उसको ही , चुप कराता फिरता पर ,
मुझको बोलती भी वो , बेज़ुबान लगती है ।।
( सौत =आवाज़ , लज़्ज़त =आनंद ,लासानी =अद्वितीय  )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Friday, October 27, 2017

ग़ज़ल : 243 - राख़ हो जाता है सब कुछ


  

   नज़र से गिरके उठने का किसी का वाक़िआ बतला ।।
   गड़े मुर्दे के चलने का किसी का वाक़िआ बतला ।।1।।
   ज़ुबाँ रखकर भी चुप रहते हैं कितने ही ज़माने में ,
   मुझे गूँगे के कहने का किसी का वाक़िआ बतला ।।2।।
   कि पड़कर राख़ हो जाता है सब कुछ आग में मुझको ,
   भरी बारिश में जलने का किसी का वाक़िआ बतला ।।3।।
   कई क़िस्से सुने लोगों से तलवारों से कटने के ,
   मुझे फूलों से कटने का किसी का वाक़िआ बतला ।।4।।
   तड़पकर भूख से मज्बूर हो इक शेर का कोई ,
   कहीं भी घास चरने का किसी का वाक़िआ बतला ।।5।।
    ( वाक़िआ = घटना , वृतांत )
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, October 21, 2017

ग़ज़ल : 242 - महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥


गड़ता कम भुँकता बुरा हूँ ।।
पिन नहीं पैना छुरा हूँ ।।1।।
एक सिर से पाँव दो तक ,
कोयले ही से पुरा हूँ ।।2।।
हड्डियों सा हूँ कभी , मैं
बिस्कुटों सा कुरकुरा हूँ ।।3।।
काठ का पहिया हो यदि तुम ,
मैं भी लोहे का धुरा हूँ ।।4।।
सबके दाँतों को हूँ कंकड़ ,
तुम्हें , चबाने मुरमुरा हूँ ।।5।।
सबको गंगा-जल उन्हेंं ही ,
महुए की कच्ची सुरा हूँ ।।6।।
अपनी मर्ज़ी से लुटा , कब
मैं चुराने से चुरा हूँ ।।7।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, August 28, 2017

ग़ज़ल : 241 - मैं हूँ लोहे का चना



राख़ को आग बनाने की न कर कोशिश तू ॥
मर चुका हूँ मैं जगाने की न कर कोशिश तू ॥ 1 ॥
मुझको मालूम है कितना तू भरा है ग़म से ,
दर्द हँस – हँस के छिपाने की न कर कोशिश तू ॥ 2 ॥
मैं तलातुम में किनारों से तो बचकर आया ,
मुझको फिर पार लगाने की न कर कोशिश तू ॥ 3 ॥
ऊँची मीनार से दे दे तू यक़ीनन धक्का ,
अपनी आँखों से गिराने की न कर कोशिश तू ॥ 4 ॥
मैं हूँ लोहे का चना मुझको समझकर किशमिश ,
अपने दाँतों से चबाने की न कर कोशिश तू ॥ 5 ॥
दिल मेरा भाग गया कब का चुराकर कोई ,
मुझको बेकार रिझाने की न कर कोशिश तू ॥ 6 ॥
( तलातुम = बाढ़ )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, August 19, 2017

ग़ज़ल : 240 - आग से ठंडी



हँसना मत , हैराँ न होना देखकर मेरा जतन ।।
कर रहा हूँ आग से ठंडी जो मैं अपनी जलन ।।1।।
कैसे कर जाते हैं लोग इसकी बुराई या ख़ुदा ,
मुझको तो जैसा भी है लगता है जन्नत सा वतन ।।2।।
दिल नहीं चाँदी हो , सोना गर नहीं हो रूह तो ,
है वो ख़ुशबूदार फूलों से निरा खाली चमन ।।3।।
उनसे तुरपाई को माँगी थी मदद ले आये वो ,
तेग़ सूई की जगह धागे की जा मोटी रसन ।।4।।
नाज़ुकी में वो गुलाबी पंखुरी से नर्म है ,
और सख़्ती में है कोहेनूर सी वो गुलबदन ।।5।।
( हैराँ =चकित ,रूह =आत्मा ,निरा खाली =सर्वथा रिक्त ,तेग़ =तलवार ,जा =जगह ,रसन =रस्सी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, August 8, 2017

ग़ज़ल : 239 - मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ



मग़्ज़ की कब सिर्फ़ दिल की सुन रहा हूँ ।।
अनगिनत ख़्वाब उनको लेकर बुन रहा हूँ ।।1।।
हो गया हूँ आज मीठा पान उनका ,
जिनको कल तक प्याज औ’ लहसुन रहा हूँ ।।2।।
पूस का जाड़ा कभी तो जेठ की लू ,
मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ ।।3।।
मैं हमेशा ही नगाड़े की न ढम-ढम ,
घुंघरुओं की भी मधुर रुनझुन रहा हूँ ।।4।।
जो मिला चुपचाप उसी को रख लिया कब ,
अपनी मर्ज़ी से मैं कुछ भी चुन रहा हूँ ।।5।।
जिसको पाने जान तक की की न पर्वा ,
आज उसे ही पाके सिर को धुन रहा हूँ ।।6।।
जब से वो मेरी हिफ़ाज़त भूल बैठे ,
दाल , गेहूँ की तरह ही घुन रहा हूँ ।।7।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...