Monday, July 3, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 872 - इक भूल.........



उनकी सब हरकतें यों थीं बेजा मगर ,
हम उन्हे हँस के माक़ूल कहते रहे ॥
बंद कर आँखें उनके गुनाहों को भी ,
छोटे बच्चों सी इक भूल कहते रहे ॥
उनके कंकड़ को नग ;
मक्खी मच्छर को खग ;
उनकी ख़स को शजर ;
धूल - मिट्टी को ज़र ;
उनको रखना था ख़ुश इसलिए झूठ ही ,
उनके काँटों को भी फूल कहते रहे ॥
(हरकत=चाल ,बेजा=अनुचित ,माक़ूल=उचित ,नग=रत्न ,खग=पक्षी , ख़स=सूखी घास ,शजर=वृक्ष ,ज़र=स्वर्ण )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, July 2, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 235 - जब तक कि मैं न आऊँ



मुट्ठी में बारिशों का सब आब रोक लेना ॥
आँखों में आँसुओं का सैलाब रोक लेना ॥
जब तक कि मैं न आऊँ तुम रात में अँधेरी ,
सूरज को मात देता महताब रोक लेना ॥
हर चीज़ छिनने देना याँ तक कि मेरी जाँ भी ,
लुटने से सिर्फ़ दिल का असबाब रोक लेना ॥
जब मुझको अंधा करने आओ तो है गुज़ारिश ,
आँखों से गिरते मेरी कुछ ख़्वाब रोक लेना ॥
जब मैं रहूँ न ज़िंदा और मेरी याद आए ,
पीने से ख़ुद को दारू-जह्राब रोक लेना ॥
पर्दानशीं हूँ फिर भी ऐ काँच के मुहाफ़िज़ ,
मुझ पर हवस के फिंकते तेज़ाब रोक लेना ॥
( आब =पानी, महताब =चाँद, असबाब =सामान, जह्राब =विषजल, मुहाफ़िज़ =रक्षक )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, June 29, 2017

ग़ज़ल : 234 - कर गया हैराँ.......



दर्द को चुपचाप ही हमने सहा ;
आँख से आँसू न कोई भी बहा ॥
हम जो सुनना चाहते थे उसने वो ,
ना ज़ुबाँ से औ’ न आँखों से कहा ॥
बुझ गए हम उसको देते देते आँच ,
वो पिघलकर भी नहीं लेकिन बहा ॥
बात तो थी फूटकर रोने की सच ,
मुँह से फूटा जाने क्यों इक क़हक़हा ?
उससे करके दोस्ती पाला था इक ,
हमने सचमुच आस्तीं में अजदहा ॥
उसको है आवाज़ से नफ़्रत बड़ी ,
उसके कानों में न गा , मत चहचहा ॥
पाप धोना है तो पश्चात्ताप कर ,
सिर्फ़ गंगा–जमुना में ही मत नहा ॥
कर गया हैराँ वो बेबुनियाद घर ,
किस बिना पर जो ढहाए ना ढहा ?
बस सका मैं उसकी आँखों में भी कब ,
वो हमेशा ही मेरे दिल में रहा ॥
( क़हक़हा = अट्टहास , आस्तीं = बाँह , अजदहा = अजगर )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, June 16, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 871 - इश्क़ की तैयारियां



छोड़कर आसानियाँ सब 
माँगता दुश्वारियाँ वो ॥
चाहता सेहत नहीं क्यों 
चाहता बीमारियाँ वो ॥
इक पुराना बेवफ़ा बस 
भूलकर बैठा ही है इत ;
उठके उत करने लगा 
नए इश्क़ की तैयारियां वो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Monday, May 29, 2017

ग़ज़ल : 233 - कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े




पहले ही बौने थे कुछ ; कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े ॥
औंधे मुँह गिरकर हो बैठे लूले औ’ लँगड़े ॥
प्यार था उनसे हमें बेइंतहा सचमुच ,
बेसबब करते रहे उनसे मगर झगड़े ॥
फूलों पे गिरकर भी कोई कट सका हम भी ,
आरियों , तलवारों पे गिरकर हुए टुकड़े ॥
नाव ने हमको डुबोने में कसर कब की ,
हम किनारे आए तिनका दाँत से पकड़े ॥
हम थे भूखे हमने पहले रोटियाँ चाहीं ,
बाक़ी नंगे चिल्ला-चिल्ला मर गए कपड़े ॥
हम भी बुनना सीख लेते जाल भी लेकिन ,
क्या करें हम आदमी थे ; थे नहीं मकड़े ॥
चढ़ गया हम पर मुलम्मा इक टिकाऊ सा ,
ज़िंदगी से इस क़दर हम हैं गए रगड़े ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, April 22, 2017

ग़ज़ल : 232 - मीर के दीवान बिकते हैं ?



कहीं पर रात में आधी ; सजे अरमान बिकते हैं ॥
कहीं पर दिन दहाड़े मौत के सामान बिकते हैं ॥
ख़रीदें ज्यों लतीफ़ों की किताबें लोग हाथों हाथ ,
नहीं क्यों दाग़ , ग़ालिब , मीर के दीवान बिकते हैं ?
कहीं पर लोग लोगों की बचा देते हैं जाँ यों ही ,
कहीं अपनों के अपनों पर किए एहसान बिकते हैं ॥
हवा मुँहमाँगी क़ीमत पे वहाँ बिकती है लेकिन मुफ़्त,
अगरबत्ती , इतर , क़ाफ़ूर औ’ लोबान बिकते हैं ॥
अगर लग जाएँ ऊँची बोलियाँ तो फिर जहाँ में सच ,
याँ अच्छे अच्छों के हाँ दीं , ज़मीर , ईमान बिकते हैं ॥
( लतीफों = चुटकुलों , दीवान = एक विशिष्ट प्रकार का ग़ज़ल संग्रह , इतर = इत्र , क़ाफ़ूर = कपूर , दीं = धर्म )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, April 16, 2017

ग़ज़ल : 231 - ख़ुश बहुत ख़ुश आए दिन



ख़ुश वो मुझको यों हमेशा ही रुला के होते हैं ॥
राधिका को कृष्ण ज्यों झूला झुला के होते हैं ॥ 1 ॥
याद तेरी जो न आए तो मैं रो पड़ता हूँ याँ ,
सब जहाँ ख़ुश बेवफ़ाओं को भुला के होते हैं ॥ 2 ॥
अपने पैरों को वो मेरे आँसुओं की धार से ,
ख़ुश बहुत ख़ुश आए दिन टप-टप धुला के होते हैं ॥ 3 ॥
सामने ही वो मेरे ; मेरे रक़ीबों को बड़े ,
प्यार से पास अपने ख़ुश हक़ से बुला के होते हैं ॥ 4 ॥
मैं तो जल उठता हूँ तब क़ागज़ सा जब अपना मुझे ,
हाथ वो मर्ज़ी से अपनी ख़ुश छुला के होते हैं ॥ 5 ॥
अपने पत्थर के पहाड़ों को हमेशा ही बड़े ,
ख़ुश मेरे सर पे वो रख-रख कर ढुला के होते हैं ॥ 6 ॥
ख़ुद को सोने के हमेशा बाँट रखकर औ’ मुझे ,
बाँझ मिट्टी के डलों से ख़ुश तुला के होते हैं ॥ 7 ॥
मेरी नींदों के लिए वो जागते हैं तब कहीं ,
ख़ुश मुझे सब रात लोरी गा सुला के होते हैं ॥ 8 ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...