Thursday, January 8, 2015

मुक्तक : 658 - तोहफ़े वो भेजें


तोहफ़े वो भेजें जानबूझकर न भूल के ।।
काँटों के वो भी नोकदार चुन बबूल के ।।
उस पर भी तुर्रा कहके ये कुबूलें हम उन्हें ,
जैसे वो फाहे रूई के हों , गुच्छे फूल के ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, January 7, 2015

मुक्तक : 657 - सिर बलाएँ अपने अनगिन


सिर बलाएँ अपने अनगिन ढोएगा सच ॥
जो भी कुछ पाया है गिन-गिन खोएगा सच ॥
मन को मेरे जो दुखा सुख पा रहा वो ,
शीघ्र पछताएगा निसदिन रोएगा सच ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, January 5, 2015

गीत (16) : इसलिए वह दिल में रहते ॥


इसलिए वह दिल में रहते ॥
रात-दिन याद उनकी आती ,
नद सरीखे अश्रु बहते ॥
सब बुरा ही कहते मुझको ।
गालियाँ ही बकते मुझको ।
इक वही दुनिया में हैं जो –
मुझको बस अच्छा ही कहते ॥
हर तरफ से कोंचती जब ।
मुझको दुनिया टोंचती जब ।
वो कवच और ढाल बनकर –
ख़ुद पे भाले-तीर सहते ॥
भीड़ मुझ पर से सम्हलती ।
रौंदती चलती कुचलती ।
वो फ़रिश्ता से उठाने –
आके मेरा हाथ गहते ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, January 4, 2015

गीत (15) : फिर अकेले में चलो ना ॥


प्रेम से यूँ मत तको ना ॥
सज-सँवर कर खण्डहर के –
फिर अकेले में चलो ना ॥
युक्ति कोई आज़माकर ।
फिर दुपट्टे को गिराकर ।
उसको शरमाकर उठाने –
सामने मेरे झुको ना ॥
बिन किये श्रंगार , बेढब ।
मुझसे टकराईं थीं तुम जब -
हड़बड़ी में जाने किसकी ?
ठीक फिर वैसी भिड़ो ना ॥
यदि न कह पाओ तो क्या डर ?
पेन-कागज़ फिर उठाकर ।
अपने मन का हाल सारा –
मुझको चिट्ठी में लिखो ना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

157 : ग़ज़ल - मुझसे फिर अपना दिल लगा दे आ ॥


मुझसे फिर अपना दिल लगा दे आ ॥
मिट रही ज़िंदगी बना दे आ ॥
गिर रहा हूँ मैं तेरी नफ़्रत से ,
कर मोहब्बत मुझे उठा दे आ ॥
तुझको मिलती है गर ख़ुशी इसमें ,
मुझको तड़पा मुझे सज़ा दे आ ॥
बेवफ़ा है बुरा है तो ज़ालिम ,
क़त्ल करके मेरा बता दे आ ॥
है अगर बेक़सूर तू तो फिर ,
कोई पक्का सुबूत ला दे आ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, January 2, 2015

मुक्तक : 656 - मत भरो आह


मत भरो आह न सिसको न तुम कराह करो ॥
मैं तो कहता हूँ हँसो और वाह - वाह करो ॥
मुझको मिटने में भी सच बनने की सी ही होगी ख़ुशी ,
शौक़ से तुम ही बशर्ते मुझे तबाह करो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

Thursday, January 1, 2015

गीत (14) : व्यर्थ रहूँ उससे आकर्षित ॥


व्यर्थ रहूँ उससे आकर्षित ॥
जिसको पाना सूर्य पे जाना ।
भर बारिश में पतंग उड़ाना ।
जिसने मुझको स्वयं रखा है –
पाने से पहले आवर्जित ॥
क्यों सुंदर वह वज्र हृदय की ?
देखो लीला भाग्य समय की ।
जो मुझसे निर्लिप्त पूर्णतः –
मैं उसपे मन प्राण से अर्पित ॥
धन कुबेर वो रंक बड़ा मैं ।
मृदु उबटन वो पंक कड़ा मैं ।
मेल न मेरा उसका फिर भी –
मैं उससे मिलने उत्कंठित ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...