Monday, May 29, 2017

ग़ज़ल : 233 - कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े




पहले ही बौने थे कुछ ; कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े ॥
औंधे मुँह गिरकर हो बैठे लूले औ’ लँगड़े ॥
प्यार था उनसे हमें बेइंतहा सचमुच ,
बेसबब करते रहे उनसे मगर झगड़े ॥
फूलों पे गिरकर भी कोई कट सका हम भी ,
आरियों , तलवारों पे गिरकर हुए टुकड़े ॥
नाव ने हमको डुबोने में कसर कब की ,
हम किनारे आए तिनका दाँत से पकड़े ॥
हम थे भूखे हमने पहले रोटियाँ चाहीं ,
बाक़ी नंगे चिल्ला-चिल्ला मर गए कपड़े ॥
हम भी बुनना सीख लेते जाल भी लेकिन ,
क्या करें हम आदमी थे ; थे नहीं मकड़े ॥
चढ़ गया हम पर मुलम्मा इक टिकाऊ सा ,
ज़िंदगी से इस क़दर हम हैं गए रगड़े ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, April 22, 2017

ग़ज़ल : 232 - मीर के दीवान बिकते हैं ?



कहीं पर रात में आधी ; सजे अरमान बिकते हैं ॥
कहीं पर दिन दहाड़े मौत के सामान बिकते हैं ॥
ख़रीदें ज्यों लतीफ़ों की किताबें लोग हाथों हाथ ,
नहीं क्यों दाग़ , ग़ालिब , मीर के दीवान बिकते हैं ?
कहीं पर लोग लोगों की बचा देते हैं जाँ यों ही ,
कहीं अपनों के अपनों पर किए एहसान बिकते हैं ॥
हवा मुँहमाँगी क़ीमत पे वहाँ बिकती है लेकिन मुफ़्त,
अगरबत्ती , इतर , क़ाफ़ूर औ’ लोबान बिकते हैं ॥
अगर लग जाएँ ऊँची बोलियाँ तो फिर जहाँ में सच ,
याँ अच्छे अच्छों के हाँ दीं , ज़मीर , ईमान बिकते हैं ॥
( लतीफों = चुटकुलों , दीवान = एक विशिष्ट प्रकार का ग़ज़ल संग्रह , इतर = इत्र , क़ाफ़ूर = कपूर , दीं = धर्म )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, April 16, 2017

ग़ज़ल : 231 - ख़ुश बहुत ख़ुश आए दिन



ख़ुश वो मुझको यों हमेशा ही रुला के होते हैं ॥
राधिका को कृष्ण ज्यों झूला झुला के होते हैं ॥ 1 ॥
याद तेरी जो न आए तो मैं रो पड़ता हूँ याँ ,
सब जहाँ ख़ुश बेवफ़ाओं को भुला के होते हैं ॥ 2 ॥
अपने पैरों को वो मेरे आँसुओं की धार से ,
ख़ुश बहुत ख़ुश आए दिन टप-टप धुला के होते हैं ॥ 3 ॥
सामने ही वो मेरे ; मेरे रक़ीबों को बड़े ,
प्यार से पास अपने ख़ुश हक़ से बुला के होते हैं ॥ 4 ॥
मैं तो जल उठता हूँ तब क़ागज़ सा जब अपना मुझे ,
हाथ वो मर्ज़ी से अपनी ख़ुश छुला के होते हैं ॥ 5 ॥
अपने पत्थर के पहाड़ों को हमेशा ही बड़े ,
ख़ुश मेरे सर पे वो रख-रख कर ढुला के होते हैं ॥ 6 ॥
ख़ुद को सोने के हमेशा बाँट रखकर औ’ मुझे ,
बाँझ मिट्टी के डलों से ख़ुश तुला के होते हैं ॥ 7 ॥
मेरी नींदों के लिए वो जागते हैं तब कहीं ,
ख़ुश मुझे सब रात लोरी गा सुला के होते हैं ॥ 8 ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, March 24, 2017

डॉ.हीरालाल प्रजापति का '' कविता विश्व ''

डॉ. हीरालाल प्रजापति का काव्य-पाठ




Dr.Hiralal Prajapati , Itarsi ( MP)


https://youtu.be/9chy6APy354

Sunday, March 19, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 870 - दाँतों को पीस



दाँतों को पीस , मुट्ठियों को कस ख़ुदा क़सम ॥
खा-खा के एक दो न बल्कि दस ख़ुदा क़सम ॥
इक दौर था पसीना मेरा ग़ुस्से में भी तुम ,
इत्रे गुलाब बोलते थे बस ख़ुदा क़सम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, March 17, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 869 - लो सप्त रंग



लो सप्त रंग घोल-घोल साथ ले जाओ ॥
कलंकहीनों संग होली खेलकर आओ ॥
रँगे सियार रँगने में न रंग ख़र्च करो ,
न रँग बदलते हुए गिरगिटों से रँगवाओ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, March 16, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 868 - किसी का मौन



किसी की चीख़ और ना फिर 
किसी का मौन रोकेगा ॥
न हिन्दू सिक्ख ईसाई 
न जैन औ’ जौन रोकेगा ॥
जब ऊग आएँगे मेरी पीठ 
पर दो पंख उड़ने को ,
मुझे छूने से फिर आकाश
 बोलो कौन रोकेगा ॥
( जौन = यवन या मुसलमान )
डॉ. हीरालाल प्रजापति


मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...