Tuesday, June 14, 2016

ग़ज़ल : 192 - कर रहे लंका को भी साकेत हम ॥



गीत एकल गा रहे समवेत हम ॥
कर रहे लंका को भी साकेत हम ॥
देखकर आकार कोई ना डरे ,
इसलिए पर्वत को कहते रेत हम ॥
दुख न हो महिषी को बस ये सोचकर ,
उसकी श्यामलता को बोलें श्वेत हम ॥
क्यों न रूठे हाय वर्षा ऋतु अरे ,
कर रहे वन दिन पे दिन सब खेत हम ?
जल नहीं तो कुछ नहीं इस बात को ,
क्यों नहीं अब भी रहे हैं चेत हम ?
निशि-दिवस चिंता चिता के तुल्य है ,
मृत्यु का समझें न ये संकेत हम ॥
मुक्ति निस्सन्देह हो अभिप्रेत पर ,
जीते जी सब हो रहे क्यों प्रेत हम ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Saturday, June 11, 2016

ग़ज़ल : 191 - फ़िक्र



फ़िक्र , फ़िक्र तंदुरुस्त गब्ज़ फ़िक्र है ॥
हर जुबाँ पे आज एक लफ़्ज़ फ़िक्र है ॥
मुफ़्लिसी किसी की कोई देख रो रहा ,
तो किसी को तक किसी का ख़ब्ज़ फ़िक्र है ॥
स्याह है ,सफ़ेद है या सुर्ख़ जर्द हाँ ,
मग़्ज़ में मगर सभी के सब्ज़ फ़िक्र है ॥
उनको चाहिए नजात अपने दस्त से ,
हमको हाय अपनी सख़्त क़ब्ज़ फ़िक्र है ॥
अपनी ज़िंदगी की बेहतरी को आज हमें ,
आती-जाती साँस चलती नब्ज़ फ़िक्र है ॥
( गब्ज़ = हृष्ट-पुष्ट , मुफ़्लिसी = कंगाली , तक = निहारना , ख़ब्ज़ = ऐश्वर्य , मग़्ज़ = मस्तिष्क )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, June 6, 2016

ग़ज़ल : 190 - बहादुरशाह ज़फ़र



 करदे मुझपे इक यही एहसान भर ॥
मेरे मुर्दे में न तू फिर जान भर ॥
ज़िंदगी भर को चले जाना तू फिर ,
पास मेरे बैठ करके आन भर ॥
जबकि रिश्ता उससे था खूँ का मगर ,
ऐसा लगता था कि थी पहचान भर ॥
आस्तीं का साँप है या दोस्त तू ,
मत मेरे बारे में उसके कान भर ?
कबसे आँखें खोलकर लेटा हूँ रे ,
नींद आ जाए तू ऐसी तान भर ॥
शे’र मत कह , कह ग़ज़ल मेरे लिए ,
एक-दो मत , अनगिनत दीवान भर ॥
ख़ूब इतराते थे चख तर माल कल ,
खा रहे हैं आज सूखी नान भर ॥
इस क़दर काटे गए उससे शजर ,
रह गया जंगल वो अब मैदान भर ॥
उनके दिलबर उनकी औलादों के अब ,
रह गए हैं बनके अब्बाजान भर ॥
रह गए बनकर बहादुरशा ज़फ़र ,
नाम के राजा हैं झूठी शान भर ॥
( आन = क्षण , दीवान = विशिष्ट ग़ज़ल संग्रह , नान = रोटी , शजर = पेड़ , दिलबर = प्रेमपात्र )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, June 5, 2016

ग़ज़ल : 189 ( B ) - उसे कैसे मैं आइसक्रीम कह दूँ ?




सबब कुछ भी नहीं जब , किसलिए फिर बेवजह बोलूँ ?
तुम्हीं बतलाओ कैसे हार को अपनी फ़तह बोलूँ ?
वो इक जलता हुआ सूरज है गर्मी का जो झुलसाता ,
उसे कैसे मैं आइसक्रीम कह दूँ या कि मह बोलूँ ?
हमेशा मैं वही बोला जो सुनना चाहते थे तुम ,
जो कहना चाहता हूँ - आज दिल बोले , मैं वह बोलूँ ॥
बख़ूबी जानता हूँ चाहता है वो मुझे लेकिन ,
मैं उससे – दूसरे को चाहता हूँ , किस तरह बोलूँ ?
मुझे मालूम है , है रेगमाल एहसास उसका पर ,
मैं बेमक़्सद न उसको काँच की चिकनी सतह बोलूँ ॥
( बेवजह = अकारण ,मह = चाँद , फ़तह = जीत , रेगमाल = एक अत्यंत खुरदुरा कागज़ , बेमक़्सद= निरुद्देश्य )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Thursday, June 2, 2016

मुक्तक : 845 - मत डरो , मत डरो ॥



इश्क़ को मानते हो अगर ज़ुर्म तो ,
चाहे हो जाए कुछ ,
मत करो , मत करो ॥
मानते हो इबादत , ख़ुदा तो न फिर ,
दुनिया से बेसबब ,
मत डरो , मत डरो ॥
जब न कोई ख़ता , जब न कोई गुनह ,
जाने अनजाने भी
यार करते नहीं ,
फिर कोई लाख माँगे अगर हो सही ,
कोई ज़ुर्माना डर ,
मत भरो , मत भरो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Wednesday, June 1, 2016

मुक्तक : 844 - कैसा वो दरिया ?





कैसा वो दर्या जिसमें न होवे है रवानी ?
फिर क्या वो कृष्ण जिसकी न मीरा हो दिवानी ?
वो उम्र जो गुज़रती हो बेइश्क़ यक़ीनन ,
बचपन है या बुढ़ापा है हरगिज़ न जवानी !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति




Monday, May 30, 2016

मुक्तक : 843 - मेरे खिलते ही




मेरे खिलते ही पूरा मुझको भी तोड़ा जाता ॥
यूँ ही गुलशन में मुझ कली को न छोड़ा जाता ॥
ख़ूबसूरत भी तो नहीं न मुअत्तर हूँ मैं ,
वर्ना मुझको भी इत्र को न निचोड़ा जाता ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...