Tuesday, January 14, 2020

मुक्तक : 948 - अदम आबाद


मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।।
हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।।
उनसे वादा था हमारा साथ मरने का ,
कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, January 13, 2020

मुक्तक : 947 - फ़र्ज़


अपने चुन-चुन दर्दो-ग़म दिल में दबाकर रख रहा ।।
हँसते-हँसते वह , न बिलकुल मुँह बनाकर रख रहा ।।
फ़र्ज़ , ज़िम्मेदारियों का वज़्न पर्वत से न कम ;
अपने पूरे घर की , फूलों सा उठाकर रख रहा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, January 11, 2020

मुक्तक : 946 - फूल


जो रखते हैं यहाँ पे चंद उसूल मुझ जैसे ;
नहीं सभी को होते हैं क़बूल मुझ जैसे ।।
गुलाब , मोगरे , कँवल की दुनिया दीवानी ;
करे है सख़्त नापसंद फूल मुझ जैसे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, January 6, 2020

दीर्घ मुक्तक - 945 - माज़ी ( अतीत )


कौन सा ज़ह्र खा हमने जाँ छोड़ दी , 
बिन तुम्हारे भी जीने को जीते रहे ।।
ये अलग बात है साथ तुम थे तो सच , 
मुश्क़िलों से ज़ियादा सुभीते रहे ।।
गर्मियों की चिलकती हुई धूप में , 
हम दरख़्तों के साए में जा बैठकर ; 
प्यास अपनी बुझाने को माज़ी में जा , 
तेरी यादों के शर्बत को पीते रहे ।। 
-डॉ हीरालाल प्रजापति

Thursday, January 2, 2020

दीर्घ मुक्तक : 944 - दीदार


बाद जाने के तेरे तुझको पता क्या फिर से तेरे ,
लौटकर आने का रस्ता रात-दिन तकते रहेंगे ।।
और कुछ हरगिज़ न बोलेंगे कभी अपनी जुबाँ से ,
सिर्फ़ तेरा नाम ही ईमान से रटते रहेंगे ।।
सख़्त तनहाई हो या महफ़िल हो इससे बेअसर रह ,
हम तेरे दीदार के प्यासे किसी मानिंदे बुत ही ,
इक दफ़ा भी इक पलक झपके बिना तेरी क़सम रे ,
सिर झुका कर बस तेरी तस्वीर ही लखते रहेंगे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Wednesday, January 1, 2020

गीत : 53 - साल नया सबको मुबारक़


हो साल नया सब को मुबारक़ न कहूँगा !!
इस बार में नववर्ष का स्वागत न करूँगा ।।
रंजीदा हूँ , ग़मगीन हूँ , मातम से भरा हूँ ,
बाहर से लगूँ ज़िंदा पर अंदर से मरा हूँ ,
महफ़िल को लगाने दो ठहाकों पे ठहाके ,
मैं तो मज़ाक़ो-मस्ख़री पे भी न हँसूँगा ।।
हो साल नया सब को मुबारक़ न कहूँगा !!
इस सन में यूँ तक़्लीफ़ उठाई है सुनो तो ,
बारिश में पतँग जैसे उड़ाई है सुनो तो ,
उम्मीद की अब भी न किरन सामने मेरे ,
बेरहम मुश्क़िलों से मैं कब तक के लडूँगा ।।
हो साल नया सब को मुबारक़ न कहूँगा !!
सूरत में किसी भी वो किसी हाल में तय थी ,
जिस ख़्वाब की ताबीर इसी साल में तय थी ,
ख़त्म उसकी मियाद हो गई जब कुछ न बचा रे ,
अरमाँ मैं भला क्या कोई अब पाल सकूँगा ?
हो साल नया सब को मुबारक़ न कहूँगा !!
इस बार में नववर्ष का स्वागत न करूँगा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, December 31, 2019

गीत : 52 - नववर्ष


किस मुंँह से फिर मनाएँ , नववर्ष का वे उत्सव ।।
जिनको मिली न जीतें , जिनका हुआ पराभव ।।
व्यसनी तो करते सेवन ; हो ना हो कोई अवसर ,
कुछ लोग पान करते ; मदिरा का हर्ष में भर ,
कतिपय हों किंतु ऐसे ,भी लोग सर्वथा जो ;
पीते असह्य दुख में , आकण्ठ डूब आसव ।।
किस मुंँह से फिर मनाएँ , नववर्ष का वे उत्सव ।।
जिनको मिली न जीतें , जिनका हुआ पराभव ।।
जीवन में जिसके संशय ; धूनी रमा के बैठा ,
दुर्भाग्य घर में घुसकर ; डेरा जमा के बैठा ,
जिस मन में व्याप्त कोलाहल-चीत्कार-क्रंदन ,
इक रंच मात्र भी ना पंचम स्वरीय कलरव ।।
किस मुंँह से फिर मनाएँ , नववर्ष का वे उत्सव ।।
जिनको मिली न जीतें , जिनका हुआ पराभव ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...