Friday, July 12, 2019

मुक्तक : 902 - चकोरा


कब मेरी जानिब वो शर्माकर बढ़ेंगे यार ?
जो मैं सुनना चाहूँ वो कब तक कहेंगे यार ?
ज्यों चकोरा चाँद को देखे है सारी रात ,
इक नज़र भर भी मुझे वो कब तकेंगे यार ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, July 11, 2019

मुक्तक : 901- बैठ जाता हूँ


मैं उनके सामने ख़ुद को गिराकर बैठ जाता हूँ ।।
उठे सर को सलीक़े से झुकाकर बैठ जाता हूँ ।।
मुझे सर पर बिठाने वो रहें तैयार लेकिन मैं ,
हमेशा उनके क़दमों में ही जाकर बैठ जाता हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, July 7, 2019

ग़ज़ल : 275 - गुलबदन


काँटे न थे हमेशा से , थे इक चमन कभी ।।
पत्थर से जिस्म वाले हम , थे गुलबदन कभी ।।
महफ़िल में भी रहे हम आके यक़्कोतन्हा आज ,
जो अपने आप में थे एक अंजुमन कभी ।।
चंद हादसों ने सच में क्या से क्या बना दिया ,
जैसे हैं आज वैसे तो न थे अपन कभी ।।
मिट्टी के ढेले बन के रह गए हैं आजकल ,
आता नहीं यक़ीं कि सच थे हम रतन कभी ।।
बारिश के रूठने से बन के नाली रह गए ,
हम भी थे दसियों साल पहले तक जमन कभी ।।
पीरी में सारी शोख़ियों ने अलविदा कहा ,
जोबन में हम में भी ग़ज़ब था बाँकपन कभी ।।
( यक़्कोतन्हा = नितांत अकेला , जमन = यमुना नदी  , पीरी = वृद्धावस्था )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, July 6, 2019

मुक्तक : 900 - ग़म का छुपाना


किसी गिर पड़े को झपट कर उठाना ।।
किसी ज़ख़्म खाए को मरहम लगाना ।।
ये आदत तुम्हारी नहीं ताज़ा-ताज़ा , 
है ये शौक़ तुममें निहायत पुराना ।।
हमें सब पता है कि क्या माज़रा है ,
कि क्या मग़्ज़े सर में क्या दिल में भरा है ?
तुम्हारा ये हर वक़्त का मुस्कुराना ,
हमें सिर्फ़ लगता है ग़म का छुपाना ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, June 22, 2019

मुक्तक


सब्र से कुर्सी पे भी सच बैठते कब हैं ?
नींद भी लेते खड़े ही लेटते कब हैं ?
हर तरफ़ माहौल बेशक़ ख़ूबसूरत है ,
आँख रखकर भी मगर हम देखते कब हैं ?
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, June 17, 2019

मुक्तक : 573 - अक़्ल



हैं उसके अक़्ल वाले द्वार बंद देखिए ।।
लेकिन दयालुता भरी पसंद देखिए ।।
करता है आज कौन उल्लुओं से दोस्ती ,
भैंसों से प्यार करता अक़्लमंद देखिए ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1718577278287991&id=100004072065187

Sunday, June 16, 2019

पिताजी


पाँव मुझ लँगड़े के दोनों , हाथ मुझ करहीन के ,
आँख मुझ अंधे की दो , बहरे के दोनों कान हैं ।।
यदि कोई मुझसे ये पूछे , हैं पिताजी क्या तेरे ?
झट से कह दूँगा नहीं कुछ किंतु मेरे प्रान हैं ।।
माँ की महिमा तो जगत में व्याप्त है आरंभ से ,
किंतु क्या माहात्म्य कम है मातृ सम्मुख पितृ का ?
यदि पिताजी पर कोई मुझसे कहे दो शब्द लिख ,
सच तुरत लेकर कलम लिख दूँगा मैं भगवान हैं ।।
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...