Monday, July 29, 2019

मुक्तक : 907 - छाता


आता हुआ मैं या फिर जाता ख़रीद लूँ ।।
मन को हो नापसंद या भाता ख़रीद लूँ ।।
लेकिन ये लाज़िमी है बाज़ार से कोई ,
बरसात आ रही इक छाता ख़रीद लूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, July 28, 2019

मुक्तक : 906 - पत्तल


किस पाप की सख़्त सज़ा चुप ऐसे काट रहा है ?
इतना भी है क्यों बेकस वो कभी जो लाट रहा है ?
हैराँ हूँ कई पेटों का वो पालनहार ही आख़िर -
क्यों ख़ुद भूख में जूठी पत्तल चाट रहा है ?
( बेकस = असहाय , लाट = लार्ड शब्द का अपभ्रंश )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, July 25, 2019

सेल्फ़ी


सब वफ़ादारी मेरी फिर आपकी , 
सिर्फ़ अपनापन ज़रा सा दीजिए ।।
ख़ूबसूरत मैं भी हूँ मुझ पर अगर , 
प्यार से अपनी नज़र इक कीजिए ।।
कुछ नहीं सचमुच नहीं कुछ आज बस , 
चाहता हूँ आप अपने हाथ से ,
सेल्फ़ी तो ख़ूब खींचीं आपने , 
इक मेरी तस्वीर भी ले लीजिए ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, July 21, 2019

मुक्तक : 906 - बोलो न अहमक़


जो बेमौत मारे गए या मरे ख़ुद , 
उन्हें तुम किसी हक़ से बोलो न अहमक़ !!
गर इतना जो हो जाता दुनिया में शायद , 
ज़मीं ही फिर हो जाती जन्नत बिलाशक़ !!
नदी-कूप पर होता प्यासों का क़ब्ज़ा , 
ग़रीबों , फ़क़ीरों का दौलत पे कुछ हक़ ,
जो होता ज़रूरी वो पास होता सबके ,
तो फिर ख़ुदकुशीे क्यों कोई करता नाहक़ ?
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, July 20, 2019

मुक्तक : 905 - तिरकिट


तिरकिट-धा-धिन-तिनक-धिन
तबला बजा बजाकर ।।
अख़बारी सुर्ख़ियों को 
पढ़-पढ़ सुना-सुनाकर ।।
लेकिन वो अपने दर्दो- 
ग़म की कहानियों को ,
बेचे कभी न हरगिज़ 
आंँसू बहा बहा कर ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, July 19, 2019

मुक्तक : 904 - फाड़कर


पथरीली सरज़मीं पर 
कर करके गहरे गड्ढे ,
फिर से न आएँ बाहर 
ऐसे मैं गाड़कर रे।।
हरगिज़ न कोई दर्जी 
फिर से जो सिल सके ,
कुछ इस तरह के टुकड़े 
टुकड़ों में फाड़कर रे ।।
कुछ आपके वहाँ का , 
कुछ मेरे भी यहाँ का ,
जानूँ न कैसा-कैसा ,
जाने कहाँ-कहाँ का ?
आँखों से अपनी चुन-चुन 
देखो मैं बेच घोड़े ,
सपनों का सारा कचरा 
सोता हूँ झाड़ कर रे।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, July 14, 2019

मुक्तक : 903 - गैया



अनुमान भी तुम ना लगा सकोगे कि भैया ,
किस धुन में चराते हुए मैं बैठा हूँ गैया ?
दिखता हूँ किनारे पे किंंतु हूँ मैं भँवर में , 
क्या पार लगेगी रे मेरी कागज़ी नैया ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...