Thursday, January 10, 2019

विवाह अभिनंदन पत्र




https://youtu.be/9chy6APy354

कर सरस्वती को नमन प्रथम गणपति का वंदन करता हूँ ।।
हों कामनाएँ पूरी मेरी विनती मन ही मन करता हूँ ।।
हिय से हो भाव विभोर तुम्हें शत-शत अभिनंदित करता हूँ ।। 
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
माँ की ममता का यह सागर मेरे दिल का उजियाला है ।।
असमर्थ हूँ यह कहने में इसे किस वात्सल्य से पाला है ?
निज उरउद्यान की नर्म कली कर कमल तुम्हारे धरता हूँ ।।
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
मम गृह जब यह बिटिया जन्मी तब वंशी तक ना बज पाई ।।
पर आज विदा के क्षण गूँजे मेरे घर आँगन शहनाई ।।
प्रकृति का कैसा अजब नियम लेकिन परिपालित करता हूँ ।। 
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
माँ भ्रातृ बहन मामा मामी यादों में इसकी खोएँगे ।।
बिछड़ी जाती आज अपनों से यह सोच सिसक सब रोएँगे ।। 
अपनी आँखों का नूर तुम्हें सौंप और प्रकाशित करता हूँ ।।
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
मम हृदय नील अकाश चंद्र सम चम चम सा यह तारा था ।।
मैं अब तक जान न पाया क्यों इस पर अधिकार तुम्हारा था ? 
मैं पित्र कहाने का अपना हक़ तुम्हें विसर्जित करता हूँ ।।
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
नवगृह पढ़ना जा रामायण संविधान और भगवद् गीता ।। 
चलना उस पथ जिस राह चलीं सावित्री,अनुसुइया , सीता ।। 
इसका हो अटल सुहाग दुआ प्रभु से ये निवेदित करता हूँ  ।। 
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।। 
-एक पुत्री का पिता
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, December 31, 2018

नववर्ष



मरने पे या किसी के जन्मने पे नचेंगे ।।
जानूँ न क्यों वलेक लोग बाग जगेंगे ।।
तुम भी तमाशा देखने को रात न सोना ।।
मरने पे मेरे थोड़ा भी मायूस न होना ।।
31 दिसंबर मैं चीख़ दे ख़बर रहा ।।
01 जनवरी को जन्मा मैं नववर्ष मर रहा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, December 23, 2018

मुक्त मुक्तक : 891 - दुशाला



चहुँदिस स्वयं को मैंने जिससे लपेट डाला ।।
ऊनी नहीं न है वो मृत वन्य मृग की छाला ।।
चलते हैं शीत लहरों के तीर जब बदन पे ,
बन ढाल प्राण रक्षा करता यही दुशाला ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, December 16, 2018

ग़ज़ल : 270 - फ़ित्रत



हमने अजीब ही कुछ फ़ित्रत है पायी यारों ।।
हर बात धीरे-धीरे-धीरे ही भायी यारों ।।
उस तक पलक झपकते हम मीलों दूर पहुँचे ,
वह दो क़दम भी हम तक बरसों न आयी यारों ।।
उसको तो मौत ने भी ख़ुशियाँ ही ला के बाँटीं ,
हमको तो ज़िंदगी भी बस ग़म ही लायी यारों ।। 
भूखे रहे मगर हम इतना सुकूँ है हमने ,
औरों की छीनकर इक रोटी न खायी यारों ।।
बदली समंदरों पर जाकर बरसने वाली ,
हैराँ हूँ आज रेगिस्तानों पे छायी यारों ।।
ख़ुश हूँ कि ग़ुस्लख़ाने में आज उसने मेरी ,
दिल से ग़ज़ल तरन्नुम में गुनगुनायी यारों ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, December 14, 2018

मुक्त मुक्तक : 890 - तस्वीर



फूलों सी खिलखिलाती , तारों सी झिलमिलाती ।।
आँखों को हर किसी की बेसाख़्ता लुभाती ।।
वो जिनकी ज़िंदगी को ग़म ने जकड़ रखा है ,
तस्वीर उनकी अक्सर होती है मुस्कुराती ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, December 6, 2018

मुक्त मुक्तक : 889 - आश्रित



पेट जो परिवार का ही पालने में मर गया ।।
शुष्क आँखों के मरुस्थल आँसुओं से भर गया ।।
अपने पालक का मरण यूँ देख उसका आश्रित आह , 
लोग डरते मृत्यु से वह ज़िंदगी से डर गया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, November 23, 2018

कविता : नास्तिकता क्यों ?


धर्मभीरु भर घृणा से करते हैं आपस में बत ।
धर्म से च्युत ईश्वर से सर्वथा हूँँ मैं विरत ।। 
पूछते रहते हैं मैं क्यों नास्तिक हूँँ तो सुनो ।
पूर्णत: ध्यानस्थ होकर तथ्यत: सर्वस गुनो ।। 
किंतु यह भी जान लो मैं यह कभी कहता नहीं ।
वह जिसे भगवान कहते सब जगह रहता नहीं ।।
पूर्णत: आश्वस्त हो निज सत्य को मैं धर रहा ।
सर्वथा है व्यक्तिगत अभिव्यक्त जो मैं कर रहा ।।
यह मेरी और उस ख़ुदा की शत्रुता का रूप है ।
जिसने मरुथल में मुझे जो धूप पर दी धूप है ।।
लोग कहते हैं कि उसके हाथ में हर बात है ।
वह जो चाहे सब छुड़ाले या वरे सौग़ात है ।।
वह असंभव को भी संभव चुटकियों में कर धरे ।
वह निपूतों की भी गोदी बाल बच्चों से भरे ।।
सच कहूँँ गुड़िया से भी प्यारी महज औलाद इक ।
हमने भी पाई थी कितनी मन्नतों के बाद इक ।।
यूँँ लगा जैसे मरुस्थल में हुई गंगा प्रकट ।
मिल गई अंधों को आँँखें भिक्षुओं को स्वर्णघट ।।
शुक्रिया रब का कभी करना ना हम भूले मगर ।
हो गया इक दिन ख़फ़ा जाने न वो किस बात पर ।।
सच कहूँँ सच्चाई से भी अत्यधिक सच्ची मेरी ।
अल्पवय में ही अचानक पुष्प सी बच्ची मेरी ।।
खेलते ही खेलते इक दिन अचानक यों गिरी ।
लाइलाज ऐसे भयानक रोग से वह जा घिरी ।।
विश्व में औषध नहीं ऐसे किसी बीमार की ।
डॉक्टर बोले ये बस पाहुन है दिन दो-चार की ।।
अस्पताल उसको लिए गोदी में हम फिरते रहे ।
बेचकर सब कुछ इलाज उसका मगर करते रहे ।।
रात-दिन करते रहे विश्वास रख रब से दुआ ।
पर चमत्कार ईश्वर की ओर से जब ना हुआ ।।
यूँँ लगे सीने में खंजर-तीर से धँसते हुए ।
उठ गई जिस दिन वो बेहोशी में भी हँसते हुए ।।
यों बिलख कर रोए हम पत्थर भी पानी हो गया ।
तब से नज़रों में हमारी रब भी फ़ानी हो गया ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
( एक मित्र के सतत अनुरोध पर यह कविता लिखी जिनकी प्राणप्रिय इकलौती पुत्री अल्पावस्था में ब्रेन ट्यूमर से इस जहाँ में नहीं रही )

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...