Friday, January 4, 2013

कहानी : एक नास्तिक की तीर्थ यात्रा


मुझे हमेशा ही अनकामन और इनक्रेडिबल बातों ने ही प्रभावित किया है। सामान्य तौर पर घटने वाली घटनाएँ मुझे चर्चा का विषय नहीं लगतीं। यानि आप सहज अनुमान लगा सकते हैं कि क्या मेरी चर्चाओं में सदैव गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स की ही घटनाएँ स्थान रखती हैं ?यह मेरी प्रकृति सी है कि मानवेत्तर घटनाएँ ही मुझे चौंका पाती हैं , अजीबोगरीब बातों में मुझे कविता की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है , विरोधाभासी बयानों में मुझे वक्ता की शक्तिशाली दुश्मन से लड़ते हुए कमजोर नायक की जद्दोजहद दिखाई पड़ती है किन्तु यह सब मेरा सनकीपन नहीं वरन सीमाओं से परे देखने की जन्मजात अनुसंधित्सु प्रवृत्ति का बाह्याचार है। मुझे चीजों को खोल खोल कर देखने की आदत है। शारीरिक सौन्दर्य अथवा कुरूपता से असरहीन मैं सीधे आत्मा में  ज़रा सी ताकत से तरबूज में घुस जाने वाली छुरी की तरह नहीं बल्कि मीठा जल निकलने के लिए चट्टानों को छेद डालने वाली दानवी यांत्रिक बोरवेल ड्रिल सा पैवस्त हो जाने का असीम धैर्य और ज़बरदस्त माद्दा रखता हूँ। कोई जल्दबाजी नहीं। मुझे रोटी की गोलाई से कोई मतलब नहीं ; उसके पके होने से ताल्लुक है। समय की कोई सीमा नहीं।
मैं चौंकना चाहता हूँ बिलकुल फिल्मों में अचानक प्रकट हो जाने वाले किसी देवी देवता अथवा पलक झपकते ही अंतर्ध्यान हो जाने नारद जी के कारण से किन्तु चील गिद्ध सी नज़रों के बाद भी कहीं ऐसी घटनाएँ मुझे देखने नहीं मिलतीं कि लगे कि ये तो चमत्कार है - जादू है - ईश्वरीय है .....सुनने ज़रूर मिलता है कि कहीं गणेश जी दूध पी रहे हैं ,तस्वीरों में माँ जगदम्बे दिखाई दे रही हैं , किसी को उसका पिछला जन्म याद आ गया है ....किन्तु जब देखने पहुँचो तब तक मैदान साफ़ हो चुका होता है और मैं एक महान आश्चर्य से विस्मित होने से वंचित रह जाता हूँ अथवा वैज्ञानिक उस घटना को वैज्ञानिक बताकर मेरे आश्चर्य की धज्जियां उड़ा देते हैं और फिर-फिर मैं ' ईश्वर है अथवा नहीं ' की विचार श्रंखलाओं में जकड जाता हूँ कि आखिर क्यों लोग मेरी तरह ऐसी ही घटनाओं के प्रतीक्षार्थी हैं कि जिनसे वे अभिभूत होकर जब कुछ समझ न आये तो उसे दैवीय चमत्कार मानकर अपनी ढुल -मुल ईश्वरीय आस्था को पुख्तगी प्रदान कर सकें। मानना चाहें तो यहाँ भी चमत्कार देख सकते हैं -कोई दस मंजिल से गिर कर भी बच गया ,भले ही वह फोम के गद्दों पर गिरा हो , फूलों अथवा नायलोन जाल पर -क्या यह संयोग कम चमत्कारिक है ? किसी के फेफड़ों में चार इंची लोहे का चौदह फुट लम्बा एंगल आर पार हो गया फिर भी वह न केवल बच गया बल्कि पूर्ण स्वस्थ भी है , एक भूख से  मरणासन्न भिखमंगे को करोड़ों का जैकपाट लग गया , एक पुछल्ला बैट्समेन जिसे बल्ला पकड़ना भी नहीं आता ; सेंचुरी लगाकर टीम को जिता  गया ....तार्किकों अथवा संशय वादियों को छोड़कर अथवा नास्तिकों या अनास्थावादियों के अलावा सभी उक्त घटनाओं से मत्कृत होकर  विस्मित  होकर रहते ही हैं। यह संयोग मात्र ही तो दैवीय है , परावैज्ञानिक है किन्तु मेरा मन माने तब न। खैर।
वह भी कुछ-कुछ  मेरा ही प्रतिरूप था - सब कुछ मानवीय और प्रयत्नों का परिणाम अथवा परिस्थितियों की परिणति मानने वाला अतः मेरी और उसकी तो जमनी ही थी बल्कि यह संयोग यानि हमारा मिलना भी यदि देखें तो किसी आश्चर्य अथवा चमत्कार से कम कहाँ था ? कारण -मिलन स्थल। हम दोनों एक तीर्थ यात्रा के दौरान मिले . मेरे बारे में तो आप अब तक अनुमान लगा ही चुके होंगे कि मैं एक नास्तिक टाइप का व्यक्ति हूँ। उसे भी आपसे परिचित कराता हूँ।

उसका नाम था - तीर्थेश्वर प्रसाद किन्तु घर में उसे सब ईश्वर अथवा ईशू-ईशू कहकर पुकारते थे और इस यात्रा में वही एक मात्र मेरे आश्चर्य का केंद्र था क्योंकि जिस खानदान से वह सम्बद्ध था परम ईश्वर भक्त उच्चकोटि ब्राह्मन का था किन्तु इसके ठीक विपरीत कम से कम बाह्य रूप से ईशू मुझे कट्टर नास्तिक लगा जो मेरी कहानी का हीरो बन सकता था -बिलकुल चिराग तले अन्धेरा ....पुलिस कमिश्नर का बेटा डाकू अथवा परम सूदखोर साहूकार के कर्ण - सम दानवीर बेटे की तरह।

जैसा उसने बताया अथवा मैंने महसूस किया। वह जन्म से ही ऐसा था। नास्तिकता के बाह्याचार तो अपनी नासमझी में अथवा बचपन में सभी बच्चे करते हैं - मसलन शंकर जी की गोल पिंडी को पत्थर का अंडा अथवा लोहे की गेंद समझकर उछालना फेंकना या ठुकरा देना , बिना नहाए धोये किसी भी देवी देवता की मूर्ती को छू या उठा लेना , भोग या प्रसाद को खा जाना ....इन सब से कोई नास्तिक नहीं हो जाता। समझ के विकसित होते ही हम सभी प्रोफेशनल पुजारियों का सा अनुकरण करने लगते हैं किन्तु जो नहीं  करता वह नासमझ नहीं  होता। ईशू भी नासमझ नहीं था।
प्रारंभ में उसकी नास्तिकता पूर्ण हरकतों पर बच्चा समझकर उसे छोड़ दिया जाता किन्तु बाद को उसे नोटिस किया जाने लगा और उस पर पूजा आरती का दबाव डाला जाने लगा और वह भी प्रारंभ में झुंझलाते हुए सर्वथा बेमन से - बाद को घर वालों का मन रखने के लिए धार्मिक कृत्य करने लगा .उसका उस कम उम्र में भी दावा हुआ करता था कि यह सब ढोंग है , बकवास है , व्यर्थ है। गंगा के स्नान मात्र से कैसे पाप मुक्त हो  सकते हैं ? नर्मदा दर्शन मात्र से अनंत फल मिल जाता है ? सत्यनारायण कथा प्रसाद ग्रहण न करने मात्र से विनाश और तरह तरह के अजीबो गरीब आकार प्रकार के देवी देवताओं के व्रत उपवासों से समस्त कष्टों का निवारण कैसे हो सकता है ? वह गहराई से सोचता था . उसके सारे तर्क वैज्ञानिक होते थे किन्तु यों ? ईश्वर की अवधारणा के औचित्य से उसे कोई  इनकार नहीं था किन्तु सांसारिक व्यक्ति के लिए कर्म छोड़कर उसकी पूजा मात्र को जीवनोद्देश्य-लक्ष्य  बनाने की बातें अथवा उपरोक्त प्रकार के पूजा फल उसे पूर्णतः अवैज्ञानिक और मनगढ़ंत एवं मूर्खतापूर्ण लगते थे। कोई जन्म से ईश्वर वादी कैसे हो सकता है ? यदि संस्कार वश वह हो भी गया हो तो उसे ऐसी क्या ठेस लगी कि वह समझदार होते ही अनीश्वरवादी हो गया ? मैं यह सब जानना चाहता था और ज़रूर ज़रूर जानना चाहता था। बाह्याचारों और आडम्बरों को मैं भी नहीं मानता किन्तु कोई सचमुच में अन्दर से कैसे यह मान सकता है कि ईश्वर है ही अथवा नहीं ही ? तर्क से परे कोई कैसे हो सकता है ? कार्य कारण का सिद्धांत यूं ही तो नहीं गढ़ा गया ?

मैं पहले ही कह चुका हूँ कि उसमें मुझे अपना प्रतिबिम्ब दिखाई देता है किन्तु हालात के बदलाव ने मुझमें भी ज़मीन आसमान से बाह्य और अंदरूनी परिवर्तन कर डाले हैं और मैं भी लगभग - लगभग कामन हूँ  अर्थात मैं अब हीरो नहीं अतः जब तक वह अपरिवर्तित रहता है मैं उसे अपनी स्टोरी का संभाव्य हीरो माँ कर चलूँगा और यदि वह मेरी तरह बदल गया तो फिर कल्पना से अपनी कहानी पूर्ण करूंगा किन्तु मैं चाहूँगा कि वह हर हाल में नास्तिक रहे - यानी सुख में भी , दुःख में भी।

मैंने उससे पूछा भी कि कई लोग हटकर दिखने के लिए भी ऐसी जीवन शैली अपनाते हैं जो लोगों का ध्यानाकर्षित करे ,कहीं तुम भी तो........? बिलकुल नहीं - उसने कहा . मुझे कभी लगता ही नहींम कि यह सब होता है . आपका शक भी बेजा नहीं है क्योंकि जिस राह जाना नहीं उसका पता क्या पूछना ?मैं भी न सोचूँ ईश्वर के बारे में किन्तु करोड़ों लोगों की ढर्रानुमा  परम्परा परंपरा मुझे भी डिगाती है कि सब तो मूर्ख नहीं होंगे जो बिना तर्क के आस्तिक हैं या तर्क करके हो गए ? मैं तो अपना सच कहता हूँ जो बिना किसी भय के मैं भरी सभा में उजागर कर सकता हूँ कि पूजा आरती से मैं बोर हो जाता हूँ। हर देवी देवता योनिज अयोनिज अवतार अथवा ईश्वर की आरती प्रार्थना का एक ही भाव - जो ध्यावे फल पावे .....तेरा तुझको अर्पण ......अरे भाई क्या ज़रुरत है इस स्तुति गान की ? यदि ईश्वर एक है तो उसके तैंतीस करोड़ रूप और प्रत्येक की अलग पूजा विधि ...........कहीं श्री गणेश , कहीं शंकर महादेव ......कहीं पिता पहले तो कहीं पुत्र पहले  ...........राम - कृष्ण - साँई ........किसको पूजें ? किसको छोड़ें ? एक मनुष्य ,एक अवतार , एक देवता , एक भगवान् ........किसका ध्यान लगाएं ? और सभी की आरतियाँ - चाहे सरस्वती- लक्ष्मी -गणेश की हो या ब्रह्मा -विष्णु - महेश की हो या शिर्डी के साँई बाबा की ..........सबका एक और एक ही मकसद एक ही अर्थ कि जो ध्यावे फल पावे .....तेरा तुझको अर्पण . तो फिर एक ही रूप क्यों नहीं ?
अलग अलग देवी देवता की अलग अलग पूजा क्यों ? ईश्वर यदि निराकार नहीं तो जब वह एक है तो उस साकार का भी सिर्फो सिर्फ एक ही सर्वमान्य निर्धारित स्वरुप क्यों नहीं ? ऐसे में भक्त के लिए मनोनुकूल  देवी देवता  का चुनाव करना बड़ा कठिन हो जाता है ? विद्यार्थी को सरस्वती तो व्यापारी को लक्ष्मी .....फिर वही ....फल सभी एक ही प्रदान करते हैं -सर्वथा मनोवांछित .....तो फिर इतने रूपों का स्रजन क्यों ......और रूप सदैव चाक्षुष होने के नाते मन में वासना भी उत्पन्न करता है ,भय भी। एक ही देवी देवता की भिन्न भिन्न मूर्तियों में तुलना भी। यह बड़ा ही सुनियोजित षड्यंत्र सा लगता है। व्यापार लगता है। दुर्गोत्सव ,गणेशोत्सव .....सब टाइम पास है। हर जगह भीड़ भाड़ शोर शराबा। जब वह यह भाषण कर रहा होता तो कुछ कुछ उन्मत्त सा हो जाता और उसके इस बहकाव में मेरे भी मन की तमाम बातें जो मैं अनिष्ट शंका वश मुँह से नहीं निकालता था ,कह जाता था . मैं उसे रोकता -तुम ऐसा कैसे कह सकते हो ?तुम्हे डर नहीं लगता कि कहीं कोई दैवी शक्ति  तुम्हारा अनिष्ट न कर डाले ?
वह बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में अपना तर्क देता – मान लो , जिसका अस्तित्व मैंने नहीं माना , जिससे मैनें कोई रिश्ता नहीं बनाया उससे दुआ सलाम का क्या अर्थ ? इसके अलावा भी मेरा मानना है कि जिसे हम प्यार करते हैं और भक्ति तो उससे भी ऊंची चीज़ है -तब हम उससे अपना स्वार्थ सिद्ध नहीं करते बल्कि उस पर अपना सर्वस्व अर्पित करने को तत्पर रहते हैं जबकि मेरे सामान्य अध्ययन और अनुभव के मुताबिक मैनें यही और सिर्फ यही पाया कि जिसे देखो वही ईश्वर को दाता मानकर भिखारी बना हुआ है , क्या यह शोभनीय है ? क्या यह स्वाभिमान के अनुकूल है कि किसी से सिर्फ स्वार्थ के लिए जुड़ें  और उसे इतना बेवक़ूफ़ जाने कि वह हमारे स्वार्थ को पहचानकर भी हमारी प्रार्थना कबूल ले ? क्या उसने हमसे कोई क़र्ज़ लिया है ,क्या वह हमारे मातहत है ?यदि हमारी मांग पूरी न करे तो दोस्ती, प्यार , भक्ति सब ख़त्म ?नहीं , यह सब मनगढ़ंत है . ईश्वर यदि है तो उसका न तो ऐसा जैसा कि प्रचलित स्वरुप है , है और न ही ऐसा जैसा कि हमारे पोथी पुराण कर्ताओं ने  फैला  रखा है कि सब कुछ छोड़ छाड़कर उसकी माला जपते रहो तो वह सबकी सुनता है , है या हो सकता है जबकि हमारा दिमाग खुद यही कहता है कि एक पुलिस कमिश्नर और एक डाकू को ईश्वर कैसे समभाव से देख सकता है ?
जब भारत में भारत पाकिस्तान का मैच होता है और भारत हार जाता है अथवा पाकिस्तान में भारत हार जाता है अथवा हमारे ही देश में विदेशी टीमें हमें हराकर चल देती हैं अथवा विदेशों में जाकर हम हारकर चले आते हैं तो क्या इसका यह मतलब है कि उनकी प्रार्थनाओं में ज्यादा दम है अथवा उनका ईश्वर ज्यादा पावरफुल है अथवा हम अच्छा खेलना नहीं जानते ? और जब हमारा कर्म ही हमारा फल प्रदाता है तब ईश्वर से ये माँगा - तूँगी व्यर्थ है। मन बहलाव है ? मैं निरुत्तर हो रहा था , वह बके जा रहा था किन्तु  मैं कैसे कहूं कि वह सच कह रहा था क्योंकि मैं खुद एक बड़ी भारी मांग की पूर्ति की आशा में इस तीर्थ को आया हूँ - ये अलग बात है कि मुझे भी मांग पूर्ति का भरोसा कुछ नहीं किन्तु ज़माने की सुन सुन कर अंतिम उपाय रूप में यही रास्ता सूझा . मैनें चिढ़कर कहा - यह तो मैं जान गया कि तुम नास्तिक हो फिर यह यात्रा किसलिए ? बोलो बोलो ? उसने हंसकर कहा -मुझे मालूम था किन्तु यह प्रश्न तो पहले ही उठ जाना था . देर से ही सही . बहुत मासूम सवाल है किन्तु उसके उत्तर पर यकीं करना , यदि आप बुद्धिवादी नहीं हैं अथवा तर्कशास्त्री अथवा संशयवादी नहीं हैं तो तो नामुमकिन होगा अतः अपने जवाब के पहले मैं आप से यह क्लियर करना चाहूँगा कि आप खुद क्या हैं -आस्तिक या नास्तिक ?
मगर जैसे कि एक नंगे के सामने अपनी गंजी या बनियान उतारने जैसा यह काम नहीं था . अपनी नास्तिकता को मैं भरपूर छुपाये रखना चाहता था जबकि वह जान चुका था कि मैं सिर्फ़ कच्छा धारी था किन्तु खुद को सूटेड बूटेड दिखा रहा था और मैं भी यह जानता था कि मैं खुद नंगा हूँ और इसलिए मैं अपने आप को ढांपने का प्रयत्न कर रहा था किन्तु आखिरकार उसने कह ही दिया . यदि आप बुरा न माने तो .....मैंने कहा -हाँ हाँ खुल के कहो . वह ध्रुवीय ग्लेशियर से टपकते विशुद्ध पानी  की तरह राजा हरिश्चंद्र लग रहा था। बोला - आप मुझे क्या समझ रहे हैं मुझे नहीं मालूम किन्तु मैं क्या हूँ आपको सच सच बताऊंगा लेकिन उससे पहले मैं कहके रहूँगा कि आख़िर मैं भी उसी समाज का अंग हूँ जिसके आप हैं फिर आपमें और मुझमें समझ का यह अंतर क्यों ? मैं एक घोर परंपरा वादी खानदानी पुजारी पुत्र होकर भी ,जिस बाह्याचार को आप मेरी नास्तिकता कहते हैं जबकि नास्तिकता किसी व्यवहार का नाम नहीं , के छुपाव को उचित नहीं मानता फिर आप क्यों न चाहकर भी सिर्फ़ बह्याचरण से आस्तिकता का प्रदर्शन कर रहे हैं ? बताइये।
हाँ नास्तिकता का प्रदर्शन टुच्चापन है -यह घातक भी है खासकर आर्थोडाक्स टाइप की भीड़  या व्यक्ति में जो जाने बगैर मान लेने की कूबत रखते हैं  , और यह भी कि नास्तिकता का अलग ही अर्थ है। आप मुझे सिर्फ़ इसलिए नास्तिक समझ रहे हैं कि मैं उन विधि विधानों का अनुपालन नहीं करता जो ज्यादातर समाज , समाज को दिखने मात्र को अनिवार्यतः करता ही है , मैं भी कर रहा हूँ किन्तु यहाँ प्रश्न सामाजिकता का नहीं वरण वैचारिकता का है - व्यवहार का नहीं चरित्र का है। मैं किसी व्यक्ति अथवा समाज को ठेस न लगे इसलिए मंदिर  में जूते उतारकर घुसता हूँ और पारिवारिक सदस्यों को दुःख न पहुंचे इसलिए मंदिर चला जाता हूँ वरना वास्तव में ईश्वर क्या है ,है अथवा नहीं हम सामान्य जनों को जानकर करना क्या है फिर भी मैं आपसे पूछता हूँ कि यदि मैं आपसे कहूं कि यदि वह नहीं है तो आप कहेंगे उसका होना अनिवार्य है , यदि नहीं भी है तो उसे होना चाहिए अतः उसकी अवधारणा एक अनिवार्यता है तो मेरा भी वही उत्तर होगा तो आप कैसे कह पाएंगे कि मैं नास्तिक
हूँ ? नास्तिक एक गाली है जिससे बचने के लिए हम आस्तिकता का ढोंग रचाते हैं किन्तु मैं प्रदर्शन अथवा दिखावे में विश्वास नहीं करता  क्योंकि संसार में लिफाफा देखकर ख़त का मजमून जानने वालों की कहीं कोई कमी नहीं है किन्तु सभ्यता , संस्कृति , संस्कार वश कोई किसी से कुछ नहीं कहता क्योंकि ज्यादातर एक ही थैली के चट्ठे बट्टे हैं। मेरी इस यात्रा ...सारी तीर्थ यात्रा का मतलब यह यह नहीं कि मैं इस सबमें विश्वास रखता हूँ , चाहें तो आप इसे मेरे पर्यटन के तौर  पर ले सकते हैं किन्तु मैनें पाया है कि जिसे देखो खाना न खाने को उपवास का नाम दिए जा रहा है , तमाम तीर्थ नगरों के पर्यटन को तीर्थ यात्रा की संज्ञा दे रहा है - अपनी कार्य सिद्धि हेतु भगवान के दफ्तर में अर्जी लगाने को भक्ति कह रहा है - यह गलत है। न तो भगवान किसी स्थान विशेष तक सीमित है और न ही उसका निश्चित पता ठिकाना है। वह सर्वत्र है या कहीं नहीं है ,वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म और विशालातिविशाल है अनंत है। उसकी उपलब्धि निमिष मात्र में खुद में हो सकती है किन्तु हमें सच्चाई स्वीकारने में डर लगता है , हम लकीर के फकीर हैं।
तमाम पुराण कथाओं में हास्यास्पद ,ऊहात्मक , सर्वथा अविश्वसनीय बातों का जहाँ तहां वर्णन है किन्तु अनिष्ठाशंका हमारे विरोध के स्वर को उठने ही नहीं देती और न हमें करना ही चाहिए क्योंकि स्तुति गान हमारे श्रद्धेय ,प्रेमास्पद , अथवा पूज्य के प्रति हमारे  विश्वास और सम्मान का अनिवार्य मानव स्वभाविक दिखावा है। मैं फिर कहूँगा यह सब वैचारिक स्तर की बातें हैं। यदि मेरे पूजा -पाठ , होम- हवन ,आरती- भजन आदि नियमित कर्मकांड न करने को आप मेरी नास्तिकता मानते हैं तो बेशक सौ फीसदी नास्तिक हूँ किन्तु मैं फिर और बार बार कहूँगा कि नास्तिकता यह नहीं है। नास्तिकता है सर्वप्रथम  स्वयं में अविश्वास और फिर जब हम खुद पर भरोसा नहीं रखते तो दूसरों पर वह मुश्किल होता है। मेरी इस तीर्थ यात्रा को भले  ही आप पर्यटन कह लें किन्तु मैं आप जैसे भक्तों के भीड़ भड़क्के में उसी नदारद भक्ति अथवा विश्वास की तलाश में आया हूँ जो अभी भी अपूर्ण है। जिसे देखो वह सिर्फ़ और सिर्फ़ दूसरों से महिमा गान सुनकर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए तत्पर लगता है और बड़े भाई मुझे तहे दिल से माफ़ करना - मैं बार बार माफी  चाहूंगा  यदि आपके  भक्त  ह्रदय  को , आपकी प्रबल आस्था को रंच  मात्र भी ठेस लगी  हो तो क्योंकि आदमी  जरा जरा सी बात को अपने ही ऊपर ले लेता है।
यह सब मेरा संलाप कहो , एकालाप कहो या बडबडाहट  या बिना जाने मान लेने वालों के प्रति खीझ कहो - सिर्फ़ उनके लिए है जो सिर्फ़ स्वयं को नास्तिक न दिखाने के लिए करते हैं। तीर्थ यात्रा तो करते हैं , मन्नत भी मानते हैं किन्तु मन में ईश्वर की परीक्षा सी लेते हैं अथवा चुनौती सी देते हैं कि देखते हैं - नाम तो खूब सुना है कि तेरे दर्शन से ये होता है , वो होता है - हमारी मुराद भी पूरी होती है या नहीं ? क्या यह सभ्यता पूर्ण है ? क्या ईश्वर ने हमारी परवरिश का ठेका ले रखा है। अब तक मैं भी उसके सुर में सुर मिलाने लगा था और उसने मुझे जब नंगा कर ही दिया तो फिर थोड़ी ही देर में मेरी शर्मो हया भी जाती रही और मैं भी खुलकर अपनी भड़ास निकलने लगा और वह इतना शांत और मनोवेत्ता था कि उसने मेरे अन्दर उबलते ज्वालामुखी को फूट जाने का पूरा पूरा मौका दिया फिर तो मेरी ज़बान कैंची कतरनी की तरह खच खच ,खच खच चलने लगी और सच पूछा जाए तो उसने मेरा कैथार्सिस कर दिया और जिसे मैं नास्तिक समझ रहा था उसने मुझे ज्वार भाटे की शांति के उपरांत आस्तिकता का वो पाठ पढाया जिसे मैं हर तीर्थ यात्री , हर एक तथाकथित भक्त के साथ शेयर करना चाहूँगा कि तीर्थेश्वर कोई और नहीं अपनी आत्मा की आवाज़ है - सच है जिसे हम नहीं सुनते नहीं मानते हम वही करते है जिसका हमें सिला मिलता है जबकि भक्ति में अंजाम की कोई परवाह नहीं की जाती।
प्यार और पूजा-भक्ति दोनों समर्पण और सिर्फ़ समर्पण का नाम है न कि याचना ,प्रार्थना या मांग का।
तीर्थ-यात्रा , तीर्थ-यात्रा है और पर्यटन ,पर्यटन।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, January 3, 2013

कहानी : राखी की ओट में इश्क


पता नहीं ऐसा क्या है मेरे साथ कि जिन दृश्यों से मैं बचना चाहता हूँ अचानक मेरी आँखों मेँ पड़ जाते हैं और एक बार फिर एक वर्जित दृश्य मेरी आँखों से गुजरा कि जिसे मैं जानता हूँ वह सुनसान मेँ एक ऐसी लड़की से मौका देखकर आलिंगन बद्ध हो रहा था जो मेरी पुख्ता जानकारी के मुताबिक उसकी धर्म बहन थी और वह भी उसे दबोचने मेँ तल्लीन थी। ज़माना बहुत खतरनाक है अतः ऐसे मौके पर हमें उनकी नज़रें बचाकर अवश्य ही चुपचाप खिसक लेना चाहिए खासकर तब जब लड़की न अपनी बहन हो और न प्रेमिका और यदि आप उससे एक तरफा मोहब्बत क्यों न करते हों तब भी ; नहीं तो आप खुद को एक बदचलन से बच जाने का वहीं जश्न मनाने अथवा उसे अपमानित करने खड़े हो जाएँ क्योंकि ऐसे मेँ अक्सर या तो आप पिट-पिटा जाएँगे अथवा दोनों मेँ से कोई न कोई आपको कारण बताकर अवश्य ट्रेन से कट मरेगा। हालांकि मैं जानता हूँ आजकल यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है फर्क सिर्फ इतना है अब पकड़े जाने पर लड़के लड़की शर्मिंदा होकर मौत को गले नहीं लगाते बल्कि अब तो लड़कों के लिए लड़की हथियाने का यह एक फंडा बन चुका है कि दीदी दीदी करके दोस्ती करो और तीर निशाने पर बैठ गया तो सेफली सेफली इश्कबाज़ी , और तो और लड़की के घर मेँ ही घुसकर।
     तो जनाब मेरे उक्त परिचित का प्रकरण कुछ ऐसा ही है और यहाँ मैं उसे एक ‘टाइप’ या ‘कैरेक्टर’ बनाकर प्रस्तुत कर रहा हूँ क्योंकि उसके जैसों की कोई कमी नहीं है वह तो कुछ इन घटनाओं से अनभिज्ञ अथवा मासूम लोग हैं जो हैरत करते हैं – थू-थू या छिः-छिः करते हैं वरना यह कोई अप्राकृतिक कृत्य नहीं है , हाँ अनैतिक चाहे जितना कह लो , महा-अधर्म कह लो , घोरतम पाप कह लो किन्तु सब कुछ परिस्थितिजन्य और स्वाभाविक।
माना कि वह पड़ोसी था , तो क्या पड़ोसी से रिश्ता जोड़ना ज़रूरी होता है –बहन का भाभी का या अन्य ?
क्या बिना रिश्ते के बातचीत जारी नहीं रखी जा सकती ? पहुँच गए साब दीदी-दीदी करके राखी बँधवाने और सामने वाली तो जैसे इनके ही इंतज़ार में राखी लिए बैठी हैं कि कब जनाब ये आयें तो सोलो गाएँ  ‘’ भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना ‘’ जबकि सगा भाई भी साक्षात विराजमान है , जैसे फेस-बुक पर लोग फ्रेंड्स की गिनती बढ़ाने मेँ लगे रहते हैं ये रक्षाबंधन पर अपने भाइयों की गिनती का रिकार्ड तोड़ना चाहती हों। पर मुंहबोला तो मुंहबोला ही होता है न , सभी मुँहबोले थोड़े ही सगे भाई की निगाहों से बहन को देखते हैं ?
जिस दिन से वह लड़की यानि उसका परिवार यहाँ आया था , जनाब देखते ही मर मिटे किन्तु शुरुआत कैसे हो ? खैर साब ! किन्तु लड़की के घर वालों को भी एक दम से विश्वास नहीं कर लेना चाहिए कि अब तो फलाना भाई बन गया है तो चाहे जब आने जाने की छूट दे दी और लो वही हुआ कि आपने तो शुरुआत ही इश्क़ के लिए की थी और ऐसे संबंध तो लंबे सान्निध्य का ही परिणाम होते हैं सो मुंहबोली भी धीरे-धीरे मुंहबोले की हरकतों का मज़ा लेने लगी और यही सब होते होते दूसरा रक्षाबंधन आ गया ,अब काहे की राखी-वाखी। खैर। इस बार लड़की खुद राखी बांधने आई और भाई साहब बचते फिरे किन्तु आखिर कब तक ? बंधवाना ही पड़ी।
आप मेरे परिचित को एकदम से घोर अनैतिक या अधम पशु समझें आपकी मर्ज़ी किन्तु इस टाइप के मुँहबोले भाई समाज मेँ कई हो सकते हैं यहाँ तक कि मैंने तो कहीं पढ़ा है कि बड़े बड़े सेलिब्रिटी साहित्यकार तक जिनसे शुरू शुरू मेँ राखी बंधवाते आए थे बाद मेँ उन्हीं को दुल्हन बना डाला तो उनका भी यही कारण निकला कि भैये ये अनैतिक कार्य आपने क्यों सम्पन्न किया तो वही घिसा पिटा जवाब – परिस्थिति साब परिस्थिति।
अब जबकि राखी बांधने के बाद मुंहबोली को मुंहबोले के सामने आना पड़े और बिलकुल जैसे सगे भाई के सामने बिना दुपट्टे के चली आती है , चली आए और लड़ियाने लगे तो मुँहबोले अंधे को तो दो आँखें ही मिल गईं समझो
और फिर धीरे – धीरे , हंसी - मज़ाक , धौल - धप्पा ये सब होने लगे तो बात तो बढ़ेगी ही न – यही हुआ। इसका यह मतलब नहीं कि मैं इस घटना को क्षम्य समझता हूँ – कदापि नहीं , किन्तु आगाह करना चाहूँगा की मुंहबोलों में मेल - मिलाप की मर्यादा होनी ही चाहिए और मेरी इस बात को कोई ‘बोला’ या ‘बोली’ खुद पर आरोप या संदेह न समझे वरन यह सावधानी के तौर पर जमाने की चाल को देखते हुए मेरी अतिशय विनम्र राय है आगे मेरे बाप का क्या किन्तु रोज़-रोज़ टी.वी. पर ऐसे अनेक अनैतिक कृत्यों की खबरें देख - देख कर मुझे ये ‘बोला’ ‘बोली’ का रिश्ता नंबर दो का लगने लगा है अतः क्षमा करें और न जाने क्यों रिश्ते बनाने में हम बड़ी जल्दबाज़ी करते हैं खासकर लड़कियां। लड़का दिखा नहीं कि भैया-भैया , आदमी दिखा नहीं कि अंकल-अंकल। मैं पुरजोर तजवीज करना चाहूँगा कि हमें नए न्यूट्रल सम्बोधन गढ़ने चाहिए ताकि यदि कल कोई ऐसा वैसा कांड हो जाए तो इसे अवश्यंभावी परिणाम समझकर छोड़ा जा सके किन्तु अब जबकि मैंने बोले को बोली के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देख ही लिया तो क्या मैं शांत रह सकता था।
मैं चुपचाप चला तो आया किन्तु मन में खलबली मची थी। मैं उससे कारण पूछ सकता था किन्तु मैंने जो अनुमान लगाए थे वही सच थे कि उन्हें अक्सर बेझिझक अकेले में मिलने के पर्याप्त अवसरों ने इस अनैतिकता कांड को प्रेरित किया था। मैं सोच रहा था कि क्या उसमें और मुझमें कोई फर्क है ? हालांकि वहाँ वह एक निश्चित योजनानुसार राखी बँधवाने गया था और लड़की बड़ी थी और यहाँ मैं लड़की से पूरे तेरह साल बड़ा था और वह मुझे राखी बांधने आई थी।
कुँवारा था मैं – पी-एच.डी. कर रहा था , अपने अपने उसूल होते हैं और उन्ही के तहत शादी कभी न करने का ख्याल रखता था। वैसे भी एक दम नीरस टाइप का आदमी था , बुक-वर्म , पढ़ाई-लिखाई में टॉप। कॉलेज में पढ़ाता था और जिस घर में किराये से रह रहा था उसके मालिक की वह सबसे छोटी बेटी थी जिसका एक भी भाई नहीं था शायद इसीलिए वह लगभग सभी किराएदार लड़कों को राखी बांधती आई थी और इसी तारतम्य में मुझे भी बांध डाली और भला मुझे क्या उज्र होता क्योंकि मेरी नज़रों में तो अभी तक सभी लड़कियां माताएँ-बहनें ही थीं। लेकिन इस बार मामला उलट था। दरअसल मैं जैसी शक्लोसूरत ,गुण - स्वभाव की लड़की चाहता था वह मुझे अब तक मिली ही न थी या यूं कहूँ कि किसी ने मेरे दिल की घंटी नहीं बजाई थी किन्तु इस लड़की से बेहिचक राखी बँधवा लेने के कुछेक महीने बाद मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं उसके प्रति एक तगड़ा खिंचाव महसूस कर रहा हूँ , कारण कि वह मनमाफिक थी किन्तु कैसे कहूँ – बैरन राखी दीवार बन गई थी। मैं उसका जायजा ले रहा था। कहीं से भी वह मुझे आशिक बनाने को तैयार नहीं लग रही थी अतः कभी हिम्मत न पड़ी। मैं जितना ज्यादा उसे चूमना चाटना दबोचना चाहता था उससे उल्स्त व्यवहार मैं करता था कि बचता फिरता था कि कहीं उसके साथ ऐसा वैसा कुछ कर न बैठूँ और इसी जद्दोजहद में मैंने वह घर छोड़ दिया किन्तु आना जाना बना रहा। वह मुझे बिलकुल सगे भाई की तरह देखती और मैं अपने कमरे पर आकर कल्पना में उसके साथ रंगरलियाँ मनाता। मैं उसका दीवाना हो चुका था और आज वह अकेली ही मेरे रूम पर उसके पापा के साथ दूसरी बार राखी बांधने आई थी। पापा उसे छोड़कर चले गए। बिलकुल सगे भाई की तरह मैंने इस बार भी बिना उज्र किए राखी बंधवा ली जबकि दिल चाहता था उसकी मांग भर दूँ।
मैं बिलकुल नहीं चाहता था की मेरे मन मैं उसके प्रति ऐसे घृणित अनैतिक विचार आयें क्योंकि जो भी हो सामाजिक दृष्टि से वह मेरी बहन थी किन्तु यह मानव मन की कमजोर प्रकृति है कि वह ऐसे सम्बन्धों में वह बहक भी सकता है। उसकी सभी बहनों की शादी बहुत ही अच्छे परिवारों में हुई थी। एम.ए. करने के बाद उसकी भी शादी होने वाली थी एक फ़र्स्ट क्लास ऑफिसर के साथ किन्तु दुर्भाग्य देखिये कि एक दिन घर में घुसकर उसका सामूहिक बलात्कार हो गया और वह मरते मरते बची। अपराधियों को केवल लंबे सश्रम कारावास की सज़ा हो गयी किन्तु रिश्ता टूट गया और उसका घर से निकलना लगभग बंद सा हो गया। इस बार मैं खुद ही जब उसके घर राखी बंधवाने आया तो दिल पर एक घूंसा सा लगा उसे देखकर- एक रसभरी गुलबदन नार सूख कर काँटा हो गयी थी। राखी तो खैर बंधवानी ही थी किन्तु इसका मतलब यह नहीं कि मेरा प्यार कम हो चुका था बल्कि अब तो इस मुकाम पर आ गया था कि मैं उसके बिना नहीं रह सकता था या यूं कहूँ कि मुझे उसकी हालत देखकर उसपर अत्यंत करुणा नहीं दया आ रही थी कि यहीं मांग भर दूँ और कलेजे में बैठाकर ले जाऊँ क्योंकि पता चला कि उसके बलात्कार की चर्चा न जाने कैसे लड़के वालों तक पहुँच जाती थी अतः जो भी देखने आता अपने घर पहुँच कर मना कर देता। मैं बड़ा दुखी हुआ। क्या करूँ ?
यहाँ मैं एक बात बिलकुल स्पष्ट कर दूँ कि मेरा प्यार बिलकुल एक तरफा था और वह मुझे सचमुच ही भाई मानती थी और सारा मोहल्ला या शहर जान गया था कि वह मुझे राखी बांधती है। इस मामले में उसे निःसन्देह चरित्र की देवी कहा जा सकता है। यदि वह ज़रा सा भी संकेत करती कि वह मुझसे पट सकती है या मुझे चाहती है तो मैं बिना देर किए उसे लपक लेता किन्तु ऐसा न हो सका और जैसा कि स्वाभाविक परिणाम होता है एक दिन वह बिना आत्महत्या किए अचानक दीर्घ बीमार होकर मर गयी किन्तु मैं जानता हूँ कि एक बलात्कार ने ही उसकी हँसती खेलती ज़िंदगी तबाह की थी – बलात्कारियों को कैद नही फांसी ही होना चाहिए। जिस दिन उसकी अर्थी उठी उसके पापा का हार्ट फ़ेल हो गया और उसकी माँ इस दोहरे सदमे से पागल हो गई या ये भी कह सकते हैं कि मर सी गई परंतु बलात्कारी अब भी ज़िंदा हैं। मैं बार बार कहूँगा कि आरोप सिद्ध बलात्कारियों को फांसी से कम सज़ा होनी ही नहीं चाहिए।
उसके चले जाने के बाद मैं पूर्ववत हो गया यानी पहले भी मैं शादी नहीं करना चाहता था और अब तो सवाल ही नहीं उठता। सिर्फ यह बहुत अखरता है कि मैंने उससे प्यार किया जिससे प्यार करना एक अनैतिकता थी – पाप था, यद्यपि मैंने कोई गड़बड़ नहीं की - न गड़बड़ी की कोशिश भी की बल्कि मैंने जितनी शिद्दत से उससे मिलना चाहा उतना ही उससे दूर रहने की कोशिश की - सिर्फ एक मुहबोले रिश्ते के नाते किन्तु इस मन का क्या करता जो शनैःशनैः उसे चाहने लगा था और मेरा मानना है कि जो बात मन मैं आ गयी उसे हुआ ही समझना चाहिए। मैंने स्वप्न में उसे कितनी बार पत्नी बनाया किन्तु यह मेरी महानता थी या कमजोरी कि मैंने कभी सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया। आज भी वह मेरे रोम-रोम में बसी है किन्तु एक बात ज़रूर कहूँगा कि हमें किसी अजनबी से ऐसे रिश्ते कदापि नहीं जोड़ने चाहिए जो इस स्वरूप को पाकर कलंकित हों।
मेरा वह परिचित मेरी नजरों में सिर्फ इसलिए बुरा नहीं है क्योंकि वह एक उफनता नवयुवा है और मैं फुल्ली मेच्योर्ड था अतः मैंने नियंत्रण कर लिया। उसे मौका मिला और वह उसे भुना रहा है। इश्क की आग कभी एक तरफा नहीं होती और जो होती है तो खुद को ही खाक करती है। मैंने सोचा उससे पूछा जाए क्या इरादा है ? सिर्फ मज़े लेकर छोड़ दोगे या मांग भी भरोगे ? क्योंकि उसका मामला राखी बीच में से निकाल दो तो सीधा प्रेम प्रकरण था जो विवाह में बदल सकता था किन्तु मेरे मामले में कोई गुंजाइश ही नहीं थी वरना एक बार तो मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि यदि वह मान गई तो मैं तत्काल उसे अपनी धर्म पत्नी बना लूँगा फिर चाहे दुनिया जो चाहे कहे – करे। किन्तु वह बहुत ही भोली थी इस मामले में और उसने अपना बहन-धर्म बखूबी निभाया। कॉलेज में सदैव सर और घर पर भाई साहब, भाई साहब कहकर बुलाती रही और मानती रही।
मुझे तो उसने अचानक से भाई बना लिया था और मैं भी झट तैयार हो गया जबकि मेरे परिचित ने एक पूर्व योजना के तहत मुंहबोली को पटाया था अतः मैं उससे पूछ ही बैठा – कल तो पिछवाड़े खूब मज़े ले रहे थे। मेरे भेद खोलने से वह थोड़ा सिटपिटा गया और मैंने उसे नार्मल करके विश्वास में लेकर सहयोग का वादा किया तो
वह मान गया , उसने सारी आंतरिक सच्चाई उगल दी जैसे अजगर अपने निगले हुए शिकार को। लगा तो मुझे बहुत बुरा – उससे घृणा भी हुई किन्तु एक बात तय थी -जैसा तब मैंने महसूस किया कि वह उसे प्यार सचमुच में करता था और वह भी। इससे पहले की तीसरी रक्षाबंधन आए मैंने उसे इस शहर से कुछ साल के लिए गायब हो जाने के लिए कहा क्योंकि उसे मेरी नज़रों में स्वयं को सच्चा प्रेमी साबित करना था और समाज को राखी वाली बात को भूल जाने का मौका देना था और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उसे रोजगार प्राप्त करना था। न जाने क्यों हमारे देश में जो कुछ भी नहीं करता वह ऐसे धंधों में ज़रूर और खूब फंसा रहता है। वह मान गया – उसे भी मना लिया होगा – वह भी तैयार थी किन्तु मैं नहीं चाहता था कि वे भागकर शादी करें ,और देखते ही देखते पूरे पाँच साल गुजर गए। वह कुछ काम करने लग गया और जब एक दिन मैंने उससे शादी की बात की तो पता चला कि अब वह उससे शादी नहीं करना चाहता , क्यों ,मैंने उसे खूब समझाया किन्तु वह अपनी ज़िद पर अड़ा रहा - जो लड़की ऐसी हो उसका क्या भरोसा ? मैंने कहा शुरुआत तो तुमने ही की थी। तो क्या उसे मान जाना चाहिए था उसने कहा ? मैं लाजवाब था। मैंने गलत समझा था कि वह उस लड़की से सचमुच प्यार करता है और तभी तो मैंने उन्हें मिलवाने की कोशिश की जबकि वास्तव में वहाँ पूर्णतः नासमझीगत यौनिक आकर्षण मात्र था। खैर मैंने उसे बिना भला बुरा कहे छोड़ दिया क्योंकि ऐसे चरित्रहीनों से और क्या अपेक्षा की जा सकती है।
मुझे थोड़ी चिंता सी हुई उस लड़की के बारे में। तो पता चला कि दो साल पहले ही उसकी शादी किसी बहुत बड़े खानदान में हो चुकी है किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि मेरा परिचित उसकी शादी पर ईर्ष्या अथवा विरह से पीड़ित नहीं हुआ ज़रूर हुआ बल्कि उसने शादी बिगाड़ने की भरपूर कोशिश की किन्तु ठोस सबूतों के अभाव में उसे पीट-पाट के भागा दिया गया और लड़की ने उसे कसम खाकर अपने सगे भाई जैसा बताया तो सब मान गए और अंततः कोई लफड़ा नहीं हुआ और शादी सकुशल सम्पन्न हो गई। आज वह कुल मिलाकर बिलकुल सुखी है और इधर मेरा परिचित किसी और से चक्कर चला रहा है किन्तु इस बार उसने राखी का नहीं फ्रेंडशिप बेल्ट का सहारा लिया है अब देखना यह है कि उनका प्यार शादी की मंजिल तक पहुंचता है या नहीं।
मुझे एक बात आज तक समझ नहीं आई कि मेरे परिचित ने यह सब मुझे क्यों नहीं बताया और पूरे दो साल तक यह बात छुपाए रखी या हो सकता है कि उसने झूठ ही कहा हो अपनी इज्ज़त बचाने के लिए कि ‘जो ऐसी लड़की हो उसका क्या भरोसा’ जबकि वह लड़की ही वांछित ,अवांछित किन्ही सार्थक ,निरर्थक कारणों से उसे रिजेक्ट कर चुकी थी और वह सचमुच उससे प्यार करता रहा हो वरना उसकी शादी में क्यों हंगामा करता ? जब बात नहीं बनी तो हार मान ली ? किन्तु क्या सच्चे प्रेमी यूं चुपचाप बैठ सकते हैं ? हत्या या आत्म हत्या उसने कुछ भी तो नहीं किया न ही किसी महान लक्ष्य का संकल्प लिया ? बस दूसरी लड़की पटाने में लग गया। शायद लमपट ही हो। खैर। मुझे क्या ? मैंने उससे नहीं पूछा बस अंदाजे ही लगाता रहा और सच मानता रहा। किन्तु मेरी रूह को अब भी सुकून नहीं है।
यद्यपि संसार में किसी को यह पता नहीं है कि मैं उससे प्रेम करता था किन्तु मैं सच कहता हूँ मुझे उससे प्यार करते हुए कभी आत्मग्लानि नहीं हुई। शुरू-शुरू में अवश्य दो-एक बार अनैतिकता बोध ग्रस्त हुआ किन्तु फिर वह दब गया और राखी पर मेरा इश्क ही हावी होता गया। कभी-कभी सोचता हूँ यदि राखी को भूल जाएँ तो क्या उसके प्रेम की आग में मेरा एक तरफा जलना गलत था जबकि वह मुझे प्यार नहीं करती थी ? यदि वह मुझे राखी नहीं बांधती तब क्या हमारी जान-पहचान प्यार में बदल सकती थी ? क्या राखी का धागा वाकई इतना मजबूत होता है कि उसके बंधन के साथ ही इश्किया जज़्बात पैदा ही नहीं होते या मर जाते हैं या मार दिये जाते हैं ? मेरे तो जन्मे और फिर लाख कोशिशों के बाद भी मैं उन्हे नहीं ही मार सका भले ही सामाजिक औपचारिकता के चलते अथवा सामाजिक भय के कारण उन्हे कभी प्रकट नहीं होने दिया तो क्या मजबूरीवश किए गए इतने त्याग मात्र को मनुष्यता माना जा सकता है ? पशुओं में रिश्तेदारी बोध नहीं होता इसलिए वे गाय से लेकर सुअर तक अनैतिक संबंध बनाते हैं अतएव वे क्षम्य हैं।
सोचता हूँ यदि मैं राखी की ओट में इश्क नहीं करता तो क्या उस परिचित को यूं ही अर्थात बिना जलील किए छोड़ देता या माफ कर देता ? यदि मैं उस लड़की से प्यार नहीं करता और वह मुझसे प्यार करने लगती और प्रकट भी कर देती तो क्या मैं भी तैयार हो जाता ? मैं तो अपना इजहारे मोहब्बत नहीं कर सका , कहीं वह भी तो केवल राखी के लिहाज वश दिल ही दिल में अनन्य प्यार करते हुए भी तो चुप नहीं पड़ी रही ? अत्यंत इज्ज़त तो वह मेरी स्टूडेंट होने के नाते भी करती हो सकती थी और मैं भी कोई बदसूरत नहीं बल्कि गबरू जवान था सिवाय इसके कि मैं रंगीन मिजाज या बातूनी या दिलचस्प आदमी नहीं था किन्तु इसका यह मतलब नहीं था कि मैं कोई ब्रह्मचारी या नपुंसक था बल्कि केवल सैद्धान्तिक कारणवश या फिर मैं खुद भी पक्का नहीं जानता , बस बचपन से ही शादी नहीं ही करना चाहता था या यूं भी कह सकता हूँ कि बंधन मुक्त रहना चाहता था , किसी भी प्रकार की कोई स्वातंत्र्य हननकारी ज़िम्मेदारी से बचा रहना चाहता था किन्तु आप इसे यह न समझिए कि छुट्टा सांड रहना चाहता था , सिर्फ शादी से मुझे अनजानी सी नफरत की हद पार करती चिढ़ सी थी।
उसकी मौत के बाद मैं बहुत से सवालों से घिरा रहता हूँ। अपनी इज्ज़त के पंचनामे से बचने के लिए किसी को कह भी नहीं सकता अतः स्वयं ही अपने सवालों के जवाब ढूँढता फिर रहा हूँ किन्तु क्या कोई सामाजिक और सार्वजनिक प्रश्न का मेरा अथवा किसी अन्य का वैयक्तिक उत्तर सर्वमान्य हो सकता है ? क्या मेरी तरह के लोगों को जम सकता है ? क्या इससे घोर अनैतिकता नहीं फैलेगी ? क्या राखी पर से विश्वास नहीं उठ जाएगा ? यदि मानलो वह मान भी जाती और हम एनी हाऊ शादी करके सुखी भी हो जाते तो क्या समाज हमें एक गलत परंपरा का संस्थापक नहीं मान लेता जबकि यदि देखा जाये तो शिक्षक तो समाज को सुसंस्कारित करने का माता-पिता के बाद सर्व प्रथम पूर्णकालिक-कर्तव्यस्थ अधिकारी होता है।
मैं भले ही न होऊँ किन्तु खुद को बड़ा ही सैद्धान्तिक व्यक्ति मानता हूँ और नैतिकता की दुहाइयाँ देते फिरता हूँ इसके बाद भी मैंने , भले ही मानसिक किन्तु स्वप्न तो अनैतिक देखे ही तो जो लोग रीढ़ विहीन हैं क्या वह मेरा उदाहरण दे देकर ( जबकि मैं एक बहुप्रतिष्ठित व्यक्ति हूँ और सच पूछा जाये तो अपनी इसी प्रतिष्ठा के रक्षार्थ ही मैं अंदर ही अंदर विलाप करते हुए बाहर हर हाल में खुश और खामोश बना रहा ) समाज में राखी की ओट में इश्क का धंधा नहीं शुरू कर देते ? अनंत काल तक जानने वाले मुझे धिक्कारते रहते और हम उनका सामना नहीं कर पाते , बाद को यही फूल सा कोमल संबंध पत्थर सा कठोर और भारी नहीं बन जाता ? जो हुआ अच्छा हुआ। बहुत दिनों से ठीक ढंग से सोया नहीं हूँ किन्तु अब सोना चाहता हूँ। क्या करूँ कब तक उसका वियोग झेलूँ ? ऐसे में कहीं किसी के सामने मुंह से सच्चाई न निकल जाये और हो सकता है मेरे साथ-साथ वह स्वर्गीया भी बदनाम हो जाये। नहीं नहीं मुझे ज्यादा नहीं सोचना चाहिए। शादी पहले भी नहीं करनी थी अब तो और भी नहीं करनी किन्तु लोग पूछेंगे तो उसका एक निरुत्तर कर देने वाला जवाब ज़रूर तैयार रखना पड़ेगा। सोचता हूँ कहूँगा मैं शादी के योग्य ही नहीं किन्तु इससे तो मेरा इज्ज़त से जीना दुश्वार हो जाएगा हालांकि मैं उसके बगैर जीने से बेज़ार जैसा ही हूँ किन्तु कभी किसी वक्त अपनी घोर बेरोजगारी से तंग आकर आत्महत्या करने में असफल हो जाने के बाद फिर कभी किसी भी हाल में आत्महत्या न करने की कसम खा ली थी अतः ख़ुदकुशी का तो सवाल ही नहीं उठता और जीने का भी कोई तर्क तो होना ही चाहिए कि नहीं ? मर के मशहूर होते हैं लोग और मैं ऐसी वाहियात और हास्यास्पद बातें करके अपनी फूल-फूल इज्ज़त को धूल-धूल करके मौत को भी बदनाम कर दूँगा ? शायद मैं पागल हो रहा हूँ , सिर फटा जा रहा है किन्तु स्साली नींद कोई गुलाम है जो पुकारते ही आ जाये ?
मेरी सोच विश्रंखलित हो रही है , कुछ समझ नहीं आ रहा है , कुछ और कहूँगा।
हाँ यह ठीक रहेगा, जब भी कोई पूछेगा मैं कहूँगा और बड़े अदम्य विश्वास से कहूँगा , आँखों में आँखें डालकर कहूँगा – मैं समाज सेवा करना चाहता हूँ और अपना परिवार बनाकर मैं वह ईमानदारी से नहीं कर पाऊँगा क्योंकि मैं एक साधारण मनुष्य हूँ और अपने परिवार की खातिर लोग सम्झौता करते फिरते हैं, बीवियों की फर्माइशों, बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए भ्रष्टाचार करते फिरते हैं मुझे यह सब सख्त न पसंद है। मुझे भ्रष्टाचार से नफरत है। मैं इसे जड़ से मिटाना चाहता हूँ। यह विचार मुझे जम गया। सौ प्रतिशत जम गया। मुझे नींद आ गयी। मैं आज भी अविवाहित हूँ और किसी को आज तक मुझ पर शक नहीं हुआ कि मैं राखी की ओट मैं इश्क़ करने वाला महान समाज सेवी हूँ। यह तो बस मैं ही जानता हूँ कि मैं कितना महान हूँ किन्तु यह दावा है परम सच्चाई है कि अपने अनैतिक प्रेम ने ही मुझे इस महान सन्मार्ग पर डाला है। अपने मूलभूत खर्चों के अलावा अपना सारा वेतन मैं ज़रूरत मंदों में खर्च करता हूँ। मुझे बच्चों से लेकर बूढ़े तक सभी प्यार करते है और कल मेरा पचासवाँ जन्मदिन है जिसमें सब जश्न मनाएंगे मेरे घर आकर।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Wednesday, January 2, 2013

1. ग़ज़ल : उचकते-कूदते बंदर.............


उचकते-कूदते बन्दर सधी जब चाल चलते हैं ।।
मेरे जंगल के  हाथी मेंढकों जैसे  उछलते हैं ।।1।।
हिमालय पे भी जब राहत पसीने से नहीं मिलती ,
हथेली आग लेकर हम मरुस्थल को निकलते हैं ।।2।।
तुम्हारे हंस बगुले जब लगाएँ लोट काजल में ,
मेरे कौए बदन पे गोरेपन की क्रीम मलते हैं ।।3।।  
जमाते हो तुम आइसक्रीम को जब सुर्ख़ भट्टी में ,
मेरे बावर्ची भजिये बर्फ़ के पानी में तलते हैं ।।4।। 
वो चुल्लू भर ही पानी में कभी जब डूबने लगते , 
बचाने को उन्हें हम कूद पड़ने को मचलते हैं ।।5।।
थे होते मोम के पहले जो बह जाते थे अश्क़ों में ,
कि हों पत्थर के अब दिल जो न शोलों में भी गलते हैं ।।6।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, January 1, 2013

कहानी : प्रेरणा

       वह लड़की कभी भी मेरी मोहब्बत की तलबगार न थी क्योंकि न तो मैं खूबसूरत ही था और न ही कोई अमीरजादा।एक मामूली नौकरी करने उसके शहर में आया था। मेरे मकान मालिक की इकलौती व अत्यंत खूबसूरत लाड़ली बेटी थी वह।मैं चौबीस का था और वह उन्नीस बीस के लगभग।
      प्रारंभ से ही सहशिक्षा काल के दौरान मेरा अनेक लड़कियों से परिचय हुआ ,दोस्ती भी खूब हुई किन्तु मेरी बदसूरती और काली कलूटी रंगत ने मेरी मोहब्बत की लालसा को कभी पूरा न होने दिया। जिससे भी प्रेमाग्रह किया उसी ने आइना दिखाकर मेरी हँसी उड़कर रख दी और अंततः शनैः शनैः मोहब्बत और शादी के ख़याल दिल ही दिल में दम तोड़ने लगे।
     अपने प्रेम निवेदनो को जिस तिस के द्वारा ठुकराए जाने के बावजूद भी कभी भी मुझमें कुछ कर गुजरने की प्रेरणा जाग्रत नहीं हुई। मैं चाहता था कोई तो कहे ''कुछ करके दिखाओ'' पर कभी ऐसा न हुआ ...और जैसे तैसे एम. ए. करके यहाँ नौकरी पर आ गया।
पहली ही बार उस सुंदरी को देखकर मोहब्बत प्राप्ति के मरे हुए विश्वास पुनः जीवित हो उठे फ़िर भी पिछली घटनाओं ने मेरे प्रेम निवेदन की हिम्मत पस्त कर रखी थी इसलिए यूँ ही एक तरफ़ा मोहब्बत की आग में जलते हुए एक वर्ष बीत गया। कुछ दिनों की छुट्टियों में घर आकर मुझे लगा कि उसके बग़ैर ज़िन्दगी संभव नहीं। छुट्टियाँ पूरी किये बग़ैर  ही लौट आया।
वह कभी कभार ही मेरे कमरे पर आया करती थी किन्तु मैं छिप छिपाकर रोज़ ही उसके नज़ारे खिड़की दरवाजों कि दरारों से कर लिया करता था . उसके पिताजी के साथ उसके घर पर ही अक्सर शाम को शतरंज की दो एक बाजियां हो जाती थीं जिसमे मैं सदैव हार जाता था और वह मजाक उड़ाती थी। खैर।
एक दिन चाय पान के दौरान उसने मुझे ''अच्छा'' कहा। मै इस ग़लत फहमी का शिकार हो गया कि हो न हो वह भी मुझे पसंद करती है बल्कि प्यार भी करती है और उस दिन के बाद से उसके मान सम्मान को मैं उसकी मोहब्बत का इज़हार समझने लगा। एक दिन बहुत हिम्मत जुटाकर एक लव लेटर उसे लिख ही डाला। बड़े ही सहज भाव से ''क्या है''कहकर उसने पत्र  ले लिया . एक सप्ताह तक कोई लिखित जवाब नहीं मिला . कई खत लिखे और वह अजीब सी रहस्यमयी मुस्कराहट के साथ उन्हें हर बार स्वीकारती रही ...किन्तु जवाब न दिया। जब असहनीय हो गया तब एक आखिरी ख़त में आत्महत्या की धमकी देकर हाँ या न में तुरंत जवाब माँगा . दुर्भाग्य से वह ख़त उसकी माँ द्वारा पकड़ा गया।
जिस वक़्त मैं बेईज्ज़त करके उसके घर से निकाला जा रहा था तब भी वह रहस्यमयी ढंग से मुस्कुरा रही थी और उसकी आँखों में व्यंग्य जैसा भाव देख कर मैं शर्म से धरती में गड़ गड़ जा रहा था।
फिर मुझसे उस शहर में नौकरी न हो सकी . अपने गाँव आ गया। आत्महत्या न कर सका था इसलिए बेमन से किसानी करने लगा .
ज़िन्दगी से बेज़ार होकर मर मर कर ज़िल्लत का जीवन काट रहा था। घर वाले मेरी हालत पर तरसते भी थे और बिगड़ते भी.
रात की तन्हाई में  मोहब्बत  का दर्द आज इतना  बढ़ा ; अपमान  की  कसक इतनी तीव्र उठी  कि उस लड़की को अपनी मौत का ज़िम्मेदार ठहराते हुए एक सुसाइड-नोट लिखा और मौत का आसन तरीका सोचने लगा।
सुबह उठकर बाज़ार से सल्फास ले आया .अपनी ज़िन्दगी कि शाम के स्वागत में खूब स्फूर्ति तथा प्रसन्नता से अपने आपको दिनचर्या में ढालकर मौत को निगलने ही जा रहा था कि दरवाज़े पर पोस्टमैन कि दस्तक हुई .उस लड़की का मेरे नाम एक रजिस्टर्ड पत्र आया था . झट पट खोलकर किसी अनजान सुप्रतीक्षित आशा से पढने लगा।लिखा था ......
     ''मुझे यकीन है आप आत्म हत्या नहीं कर सकते . आपके बारम्बार दयनीय व सच्चे प्रेमाग्रह ने और उस दिन की अपमान जनक घटना ने आपके जाने के बाद मुझे आपके प्रेम को स्वीकार करने पर विवश कर दिया है ,किन्तु एक ही शर्त पर मैं आपसे शादी का वायदा करती हूँ कि तीन साल के अन्दर अन्दर आप आई ए एस अफसर बनकर मेरा हाथ मांगने आयें किन्तु इस बीच आपके और मेरे बीच न कोई पत्र व्यवहार होगा और न मेल मिलाप। आप शूद्र हैं और मैं उच्च वर्ण ...किन्तु अपनी ज़िद से माँ बाप को मना लूंगी। अवधि याद रहे ......अधिकतम तीन साल . अनवरत प्रतीक्षारत ......... सिर्फ़ और सिर्फ़ आपकी.......अनन्य प्रेमिका ..........
साथ में उसका एक अत्यंत सुन्दर फुल साइज़ रंगीन फोटो भी था।
इस पत्र से मेरी ज़िन्दगी का रंग ढंग बदल गया। टूटे क़दम पंख बन गए। सब कुछ भूलकर प्राण पण से लोक सेवा परीक्षा की तैयारी में अनवरत रूप से जुड़ गया। प्रेरणा रंग लाईI तीसरा साल जाते जाते मैं कलेक्टर के पद हेतु चयनित हो गया। बड़ी उमंगों सहित उसके घर उसका हाथ मांगने अपने पिताजी के साथ पहुंचा।
ड्राइंग रूम में ही उसकी तस्वीर पर चढ़ी चन्दन की फूल माला ने मुझ पर तीव्र वज्राघात किया.मैं निष्प्राण सा हो गया। उसके पिता ने सुबकते हुए बताया कि ...मेरे जाने के सप्ताह भर बाद ही एक दुर्घटना में उसके दोनों पैर जाते रहे व फूल सा सुन्दर चेहरा मांस उधड़ जाने की वजह से कुरूप हो गया । हालत सम्हलने पर उसने मुझे वह पत्र लिखा जिसे खुद उसके पिता ने रजिस्ट्री द्वारा मुझे प्रेषित किया। कुछ ही रोज़ बाद अपनी विकलांगता और बदसूरती के बोध से आत्म प्रताड़ित होकर एक साथ नींद की कई गोलियां लीलकर सदा सदा के लिए सो गई।
एक कभी न भरने वाली कमी , एक कभी न मिटने वाली असहनीय तड़प लेकर मैं अपनी लाश को किसी तरह ढो लाया।
अब भी यही सोचता हूँ कि यदि वह जिंदा होती तो क्या उस ''बदसूरत'' (  जिसकी खूबसूरत तस्वीर को मैं ढाई साल तक शिद्दत से चूमता रहा ) से मैं ( बद्सूरत ) मोहब्बत कर पाता ?  यदि नहीं तो मुझे मोहब्बत के नाम पर ठेंगा दिखाने वाली सुंदरियों ने मेरे साथ कोई अन्याय नहीं  किया था न कि उस लड़की ने जिसको लव लेटर पकड़े जाने के बाद बेइज्ज़त होते वक़्त मैंने मन ही मन उसकी बर्बादी की असंख्य  बद्दुआएँ जाते जाते दे डाली थीं ...क्या वे ही तो उसे नहीं लग गईं ?इस अपराध बोध ने कि  '' मैं ही उसका कातिल हूँ '' प्रायश्चित्त स्वरुप आज तक मुझे विवाह नहीं करने दिया ..............और न आगे कभी करूँगा...................
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...