Tuesday, February 25, 2025

ग़ज़ल

 











सच कहता हूॅं हर क्षण , प्रतिपल ,

मैं हूॅं तेरी प्रीत में पागल ।।

तेरी , मेरी क्या तुलना ?  तू ,

स्वर्ण खरा मैं केवल पीतल ।।

मैं भी बजता , बजती तू भी ,

पर मैं घण्टा , तू है पायल ।।

मैं भी सबकी प्यास बुझाता ,

पर तू मदिरा , मैं सादा जल ।।

तेरा मेरा मेल कहाॅं ? तू ,

नील नदी मैं थार मरुस्थल ।।

माना मैं भी पुष्प हूॅं पर सच ,

मैं गुड़हल तू रक्तिम पाटल ।।

मैं गाता भी काक लगूॅं तू ,

चीखे भी तो लगती कोयल ।।

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 



Sunday, February 23, 2025

ग़ज़ल

 











इसमें अभिलाषाओं की कुछ भस्म भर है ।।

आजकल मेरा हृदय परित्यक्त घर है ।।

पहले मनुजों के भी थे रहवास इस पर ,

अब धरा देवों या दनुजों का नगर है ।।

हाॅं मेरे दृग शुष्क मरुथल ही लगें पर ,

मन निरंतर अश्रुओं से तर ब तर है ।।

मुझसे क्यों ताली बजाने को कहो जब ,

जानते हो मेरा केवल एक कर है ?

उनके आगे मुॅंह नहीं खुलता किसी का ,

मेरे सम्मुख मूक भी होता मुखर है !!

हाॅं ! कला ही से न सबका पेट भरता ,

पर नहीं अभिशाप ये , ये एक वर है ।।

रोके क्या कर लेगा कोई जानकर भी ,

यह कि जीवन अंततोगत्वा समर है ?

-डाॅ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक : 948 - अदम आबाद

मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...