■ चेतावनी : इस वेबसाइट पर प्रकाशित मेरी समस्त रचनाएँ पूर्णतः मौलिक हैं एवं इन पर मेरा स्वत्वाधिकार एवं प्रतिलिप्याधिकार ℗ & © है अतः किसी भी रचना को मेरी लिखित अनुमति के बिना किसी भी माध्यम में किसी भी प्रकार से प्रकाशित करना पूर्णतः ग़ैर क़ानूनी होगा । रचनाओं के साथ संलग्न चित्र स्वरचित / google search से साभार । -डॉ. हीरालाल प्रजापति
Friday, November 15, 2019
Tuesday, November 12, 2019
ग़ज़ल : 281 - दिला
अजब इक ग़मज़दा के पीछे चलता क़ाफ़िला है ।।
नहीं रोता कोई हर शख़्स का चेह्रा खिला है ।।
जो कहता था न जी पाऊँगा इक दिन बिन तुम्हारे ,
वो सालों-साल से ख़ुश रह रहा मेरे बिला है ।।
न जाने किस ग़लतफ़हमी में पड़ वो मुझसे रूठे ,
बता दें गर तो कर दूँ दूर जो शिक्वा-गिला है ।।
मैं जैसा भी हूँ अपनी वज़्ह से हूँ और ख़ुश हूँ ,
ये मेरा हाल मेरी हक़परस्ती का सिला है ।।
कोई कितना भी ताक़तवर हो लेकिन आदमी के ,
हिलाने से न इक पर्वत कभी कोई हिला है ।।
वो झूठा है जो कहता है कि उसने जो भी चाहा ,
उसे हर बार आगे-पीछे या अक्सर मिला है ।।
बना हो जो निखालिस और ख़ुशबूदार ज़र से ,
भला किसका यहाँ उसके सिवा वो दिल ; दिला है ।।
( बिला =बग़ैर , हक़परस्ती =सत्यनिष्ठा , ज़र =स्वर्ण , दिला =हे हृदय )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
Sunday, November 10, 2019
दीर्घ मुक्तक : 936 - हाय
बस उसको देखते ही सच ,
कई सालों पुरानी इक ,
मैं अपनी ही क़सम का ख़ुद
ही क़ातिल होने जाता हूँ ।।
मोहब्बत में नहीं हरगिज़
पड़ूँगा ख़ूब सोचा था ,
मगर अब इश्क़ में हर वक़्त
ग़ाफ़िल होने जाता हूँ ।।
न लैला का मुझे मजनूँ ,
न बनना हीर का राँझा ;
न मस्तानी का बाजीराव ,
ना फरहाद शीरीं का ;
करूँ क्या बन रही जो
फ़ेहरिस्त अब आशिक़ों वाली ,
मैं उसमें सबसे ऊपर हाय
शामिल होने जाता हूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
Saturday, November 9, 2019
दीर्घ मुक्तक : 935 - सूरज
जो पकड़ पाता नहीं खरगोश का बच्चा ,
अपनी इक मुट्ठी में गज-ऊरज पकड़ डाला ।।
जो न गुब्बारा फुला सकता , बजाने को ,
आज उसने हाथ में तूरज पकड़ डाला ।।
आज तो जानूँ न क्या-क्या मुझसे हो बैठा ?
पत्थरों में फूल के मैं बीज बो बैठा ।
धूप में भी जो झुलस जाता है रात उसने ,
दोपहर का स्वप्न में सूरज पकड़ डाला ।।
( गज-ऊरज = बलिष्ठ हाथी , तूरज = तुरही जिसे उच्च शक्ति से फूँककर बजाया जाता है )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
Tuesday, November 5, 2019
ग़ज़ल : 280 - लफ़ड़ा है
बेसबब मेरा नहीं दुनिया से झगड़ा है ।।
मुझको सच कहने की बीमारी ने जकड़ा है ।।
गर वो अब मुझसे लड़ा सीधा पटक दूँगा ,
देखने में वो भले ही मुझसे तगड़ा है ।।
दोनों तन्हाई में छुप-छुप मिलते , बतियाते ,
बीच में उनके यक़ीनन कुछ तो लफड़ा है ।।
मैं भी चिकना था मगर हालात ने मुझको ,
जाने किन-किन पत्थरों पर पटका-रगड़ा है ?
मर के भी मुझ में लचक उसके लिए बाक़ी ,
मेरी ख़ातिर अब भी वह मुर्दे सा अकड़ा है ।।
मुझसे बचकर भागने वाले ने जाने किस ,
रौ में बह ख़ुद आज मेरा हाथ पकड़ा है ?
और क्या सामान जीने लाज़मी मुझको ,
एक घर ,भरपेट रोटी , तन पे कपड़ा है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
Sunday, November 3, 2019
मुक्तक : 934 - अगर बख़्श दे मौत
कहा मैंने गोरे से गोरे को काला ,
सताइश मैं अब सबकी खुलकर करूँगा ।।
महासूम बनकर रहा अब क़सम से ,
मैं फ़ैय्याज़ बस कर्ण जैसा बनूँगा ।।
अभी तक किसी के लिए ना किया कुछ ।
हमेशा लिया ही लिया ना दिया कुछ ।
अगर बख़्श दे मौत कुछ और दिन सच
मैं इस बार औरों की ख़ातिर जिऊंगा ।।
( सताइश = प्रशंसा , महासूम = बहुत बड़ा कंजूस , फ़ैय्याज़ = दानी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
Saturday, November 2, 2019
दीर्घ मुक्तक : 933 - दुनिया
माँगा था मैंने उनसे जो चाह कर भी अब वे ,
मालूम है न हरगिज़ ला पाएँगे कभी रे ।।
रहता है फिर भी उनका ही इंतिज़ार भरसक ,
है जब पता न वे अब आ पाएँँगे कभी रे ।।
बनकर हमारी दुनिया ; दुनिया से जाने वाले ।
होकर हमारे हमको ,अपना बनाने वाले ।
करते न प्यार इतना गर जानते कि दिल से ,
शायद न जीते जी वे जा पाएँगे कभी रे।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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मुक्तक : 948 - अदम आबाद
मत ज़रा रोको अदम आबाद जाने दो ।। हमको उनके साथ फ़ौरन शाद जाने दो ।। उनसे वादा था हमारा साथ मरने का , कम से कम जाने के उनके बाद जाने दो ...






